उष्ण प्रचंड गर्मी के बीच बुधवार की प्रातः बेला में मुनि श्री108 निष्प्रह सागर जी महाराज ने स्वयं अपने हाथों से अपने केशो का लोचन किया। मुनि श्री का उपवास रहेगा। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर...
रामगंजमंडी। उष्ण प्रचंड गर्मी के बीच बुधवार की प्रातः बेला में मुनि श्री108 निष्प्रह सागर जी महाराज ने स्वयं अपने हाथों से अपने केशो का लोचन किया। मुनि श्री का उपवास रहेगा। क्या आप खुद अपने हाथों से सिर के या मूंछों के बाल उखाड़ने का साहस करेंगे, शायद नहीं, क्योंकि इसकी असहनीय पीड़ा के कारण आप यह जोखिम नहीं लेना चाहेंगे। अपने हाथों से केशों को उखाड़कर दिगम्बर जैन संत इस बात का परिचय देते हैं कि जैन धर्म कहने का नही बल्कि सहने वालों का धर्म है। जैन धर्म में साधु संत कठिन से कठिन तपस्या को सहजता से सहन कर लेते हैं, कैसा भी मौसम हो, पद विहार करते है, चाहे कितनी भी लंबी यात्रा क्यों ना हो। एक बार आहार ग्रहण करते हैं वो भी खड़े होकर। इन्हीं मूलगुणों में एक मूलगुण कठिन तपस्या है केशलोंच। दिगंबर मुनि एक केशलोंच के बार दूसरी बार केशलोंच कम से कम 2 माह और अधिक से अधिक 4 में करते है, यह इनकी तपस्या का अनिवार्य हिस्सा है। केशलोंच करते हुए मुनि घास फूस की तरह अपने हाथों से सिर, मूंछ और दाढ़ी के बालों को उखाड़ते हैं।जिससे दर्द का अनुभव नहीं होता
साधु शरीर की सुंदरता को नष्ट करने और अहिंसा धर्म पालन के लिए केशलोंच करते हैं। बालों को निकालते समय कण्डे की राख का उपयोग करते हैं ताकि पसीने के कारण हाथ न फिसल जाएं और खून निकलने पर अधिक न निकले और रोग ना फैले। दिगंबर साधू केशलोंच करते समय यह भाव रखते है कि कर्माे की निर्जरा हो रही है और पाप कर्म निकल रहे हैं, जिससे दर्द का अनुभव भी नहीं होता। केशलोंच करने के पीछे एक कारण यह भी है कि साधु किसी पर अवलम्बित नहीं रहते हैं, वह स्वावलंबी होते हैं। इससे हिंसा भी नहीं होती।
केशलोंच से बढ़ती है सुंदरताशरीर की सुंदरता बालों से होती है। हाथों से बालों को निकालने पर शरीर की सुंदरता की इच्छा भी चली जाती है। इससे संयम का भी पालन होता है। जैन साधु जब केशलोंच करते हैं तो उनकी आत्मा की सुंदरता भी कई गुना बढ़ जाती है। यही वजह है कि जैन साधू अपने आत्म सौंदर्य को बढ़ाने के लिए कठिन से कठिन साधना करते हैं।
केशलोंच के दिन उपवासजिस दिन जैन मुनि केशलोंच करते हैं। उस दिन उपवास भी रखते है ताकि केशों के लुंचन से बालों में होने वाले जीवों का जो घात हुआ या जो उन्हें कष्ट हुआ, उसका प्रयाश्चित हो सके। कई लोग कहते है कि क्या अपने बालों को हाथों से उखाड़ना शरीर को कष्ट देना नहीं है? बालों को उखाड़ना शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि शरीर की उत्कृष्ट साधना शक्ति का परीक्षण है।



