मुरैना। श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में विराजमान आचार्यश्री 108 उदारसागर जी महाराज एवं मुनिश्री 108 उपशांतसागर जी महाराज के मंगल सान्निध्य में आयोजित धर्मसभा में श्रद्धालुओं को मोक्षमार्ग, सम्यग्दर्शन, जिनेन्द्र भगवान के दर्शन और मंदिर की मर्यादा का महत्व समझाया गया।

दोनों संतों ने कहा कि मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य आत्मकल्याण करते हुए मोक्षमार्ग पर अग्रसर होना है।

सम्यग्दर्शन देता है सही दिशा

आचार्यश्री उदारसागर जी महाराज ने कहा कि सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र मोक्षमार्ग के तीन प्रमुख आधार हैं। इनमें सम्यग्दर्शन को कर्णधार माना गया है, क्योंकि वही ज्ञान और चरित्र को सही दिशा प्रदान करता है।

उन्होंने कुशल नाविक का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार नाविक नाव को सुरक्षित दूसरे किनारे तक पहुंचाता है, उसी प्रकार सम्यग्दर्शन आत्मकल्याण के मार्ग में कुशल कर्णधार की भूमिका निभाता है। सही दृष्टि के अभाव में मनुष्य का ज्ञान एवं आचरण भी अपने वास्तविक उद्देश्य से भटक सकता है।

आचार्यश्री ने कहा कि जैसे राज्य संचालन के लिए राजा, मंत्री और सेनापति आवश्यक होते हैं, वैसे ही मोक्षमार्ग में सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र अनिवार्य हैं। सम्यग्दर्शन सही दिशा निर्धारित करता है, सम्यग्ज्ञान उस मार्ग का बोध कराता है और सम्यक्चरित्र उस पर चलने की प्रेरणा देता है।

उत्तम बीज की तरह है सम्यग्दर्शन

आचार्यश्री ने सम्यग्दर्शन की तुलना बीज से करते हुए कहा कि जिस प्रकार उत्तम बीज से स्वस्थ वृक्ष विकसित होता है, उसी प्रकार सम्यग्दर्शन से ज्ञान और आचरण में वास्तविक सम्यकता आती है। धर्म को केवल सुनने अथवा धार्मिक क्रियाओं तक सीमित न रखकर जीवन में सही दृष्टि, ज्ञान और आचरण अपनाना चाहिए।

भगवान के गुणों को जीवन में उतारें

मुनिश्री उपशांतसागर जी महाराज ने कहा कि जिनेन्द्र भगवान के जिनबिंब का श्रद्धापूर्वक दर्शन जैन आस्था में अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। दर्शन के समय मन में भगवान के गुणों का चिंतन और आत्मशुद्धि का भाव होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि केवल आंखों से भगवान को देखना ही दर्शन नहीं है, बल्कि उनके गुणों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास ही सच्चे दर्शन की सार्थकता है।

बच्चों को आचरण से दें संस्कार

मुनिश्री ने कहा कि धार्मिक संस्कारों के निर्माण में माता-पिता की भूमिका महत्वपूर्ण है। बच्चे बड़ों के आचरण का अनुकरण करते हैं। यदि परिवार के बड़े मंदिर में श्रद्धापूर्वक नमस्कार करेंगे और धार्मिक मर्यादाओं का पालन करेंगे, तो बच्चों में भी स्वाभाविक रूप से अच्छे संस्कार विकसित होंगे।

उन्होंने मंदिर की मर्यादा बताते हुए कहा कि जब कोई श्रद्धालु अभिषेक या पूजन कर रहा हो, तब उसके बीच से नहीं निकलना चाहिए। उसकी धार्मिक भावना और एकाग्रता का सम्मान करना प्रत्येक श्रद्धालु का कर्तव्य है।

धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं ने दोनों संतों के प्रेरणादायी प्रवचनों का श्रद्धापूर्वक श्रवण किया।

श्रीफल साथी : मनोज जैन नायक, मुरैना