मुरैना। श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में वर्षायोग के अंतर्गत आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्यश्री 108 उदारसागर जी महाराज ने कहा कि मनुष्य को विवेक एवं समझदारी के साथ जीवन जीते हुए अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि शरीर से जुड़े कार्य और संसार की गतिविधियां समय के साथ भुला दी जाती हैं, किंतु आत्मा का कल्याण ही जीवन का वास्तविक उद्देश्य है।
मृत्यु चिंतन भय नहीं, सही दिशा देता है
आचार्यश्री ने कहा कि शरीर नश्वर है और मृत्यु निश्चित है। मृत्यु का चिंतन भय उत्पन्न करने के लिए नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने के लिए आवश्यक है। जब व्यक्ति इस सत्य को समझ लेता है कि एक दिन संसार छोड़कर जाना है, तब उसके भीतर मोह, अहंकार और संग्रह की प्रवृत्ति कम होने लगती है।
उन्होंने कहा कि ऐसा व्यक्ति धर्म, संयम, सदाचार और आत्मकल्याण की ओर अग्रसर होता है। मनुष्य को अपने समय का सदुपयोग करते हुए श्रेष्ठ कर्म करना चाहिए और आत्मा की उन्नति के लिए निरंतर प्रयासरत रहना चाहिए।
धन, पद और प्रतिष्ठा स्थायी नहीं
आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य का अधिकांश जीवन भविष्य की योजनाएं बनाने और इच्छाओं की पूर्ति में बीत जाता है। वह धन अर्जित करने, संपत्ति बढ़ाने और सुख-सुविधाएं जुटाने में लगा रहता है, किंतु यह निश्चित नहीं कि उसे इतना समय मिलेगा भी या नहीं।
उन्होंने कहा कि धन-संपत्ति, परिवार, पद और प्रतिष्ठा जैसी वस्तुएं स्थायी नहीं हैं। मृत्यु के समय सब कुछ यहीं रह जाता है और जीव अपने कर्मों के साथ आगे बढ़ता है। इसलिए सांसारिक वस्तुओं का उपयोग करते हुए भी उनमें अत्यधिक आसक्त नहीं होना चाहिए।
श्रेष्ठ कर्म हैं वास्तविक संपत्ति : मुनिश्री उपशांतसागर
मुनिश्री 108 उपशांतसागर जी महाराज ने कहा कि मनुष्य को समय-समय पर अपने जीवन का मूल्यांकन कर स्वयं से पूछना चाहिए कि उसका वास्तविक लक्ष्य क्या है। शरीर, वैभव और सांसारिक उपलब्धियों पर अहंकार करने के बजाय विनम्रता, सदाचार, धर्म और आत्मचिंतन को महत्व देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मनुष्य की वास्तविक संपत्ति उसके अच्छे संस्कार, श्रेष्ठ कर्म और आत्मिक उन्नति हैं। यही तत्व उसे सही दिशा प्रदान करते हैं और आध्यात्मिक विकास का आधार बनते हैं।
श्रीफल साथी : मनोज जैन नायक, मुरैना





