ललितपुर। पर्युषण पर्व के अवसर पर श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन अटा मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्रेष्ठ विद्यासागर महाराज के प्रभावक शिष्य मुनि श्री विशदसागर महाराज ने कहा कि जिस प्रकार तपाने से अशुद्ध वस्तु शुद्ध होती है, उसी प्रकार तप के माध्यम से आत्मा को निर्मल बनाने पर जीवन में निखार आता है और परिणाम शुद्ध होते हैं।
इच्छाओं का निरोध ही तप है
मुनि श्री ने कहा कि इच्छाओं का निरोध भी तप है। ध्यान और स्वाध्याय के माध्यम से इंद्रिय विषयों तथा कषायों का निग्रह करना ही वास्तविक तपस्या है। किसी तपस्वी के तप और त्याग को देखकर श्रद्धा का भाव स्वतः जागता है।
उन्होंने कहा कि इंद्रिय विषयों पर विजय प्राप्त करना ही सच्ची साधना है। तप से आत्मा निर्मल होती है और शांति की अनुभूति होती है। जीवन को व्यवस्थित रखने के लिए मन, वचन और काय की क्रियाओं को संयमित करना आवश्यक है।
इंद्रियों पर अंकुश से मिलेगा आनंद
मुनि श्री ने कहा कि आज मनुष्य इंद्रियों के वशीभूत होकर अनेक पापों का बंध करता है और स्वयं अशांत होता है। इंद्रियों पर अंकुश लगाकर तथा कषायों को नियंत्रित कर व्यक्ति जीवन को आनंदमय बना सकता है।
तत्त्वार्थसूत्र का वाचन और समाधान
धर्मसभा के प्रारंभ में पाठशाला परिवार के अभ्यांश सेमरा, अनव अंचल, सपना एवं आर्या जैन ने तत्त्वार्थसूत्र का वाचन किया। अर्घ्य समर्पण संजय-अंजलि सराफ द्वारा किया गया। मध्यान्ह में मुनि श्री ने तत्त्वार्थसूत्र को विस्तार से समझाते हुए श्रद्धालुओं की जिज्ञासाओं का समाधान किया।
मंदिरों में जारी हैं पर्व के आयोजन
नगर के जैन मंदिरों में प्रातःकाल पूजन-अर्चन, विधान, श्रीजी का अभिषेक और शांतिधारा के माध्यम से श्रद्धालु धर्मलाभ ले रहे हैं। अभिनंदनोदय तीर्थ में भक्तामर महाआरती तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बच्चों की प्रस्तुतियां आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं।
सायंकाल श्री पार्श्वनाथ जैन अटा मंदिर में कल्पना चौधरी के संयोजन में आरती हो रही है, जिसमें श्रद्धालु भक्तिभाव से सहभागिता कर रहे हैं।




