कुण्डलपुर। निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 समतासागर जी महाराज ने प्रवचन में कहा कि मोक्ष का मार्ग श्रमशील श्रमणों का मार्ग है। श्रमण वही है, जो निरंतर श्रम, साधना और आत्मकल्याण के प्रयास में लगा रहता है।
उन्होंने कहा कि बिना परिश्रम के प्राप्त वस्तुओं का वास्तविक मूल्य समझ में नहीं आता, जबकि स्वयं की मेहनत से अर्जित छोटी उपलब्धि भी व्यक्ति को विशेष संतोष देती है। इसलिए जीवन में श्रम और पुरुषार्थ से कभी पीछे नहीं हटना चाहिए।
विचार और साधना में लगाया श्रम भी महत्वपूर्ण
राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं प्रचारमंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ के अनुसार मुनिश्री ने कहा कि श्रम केवल शारीरिक परिश्रम तक सीमित नहीं है। विचार, चिंतन, ज्ञान, ध्यान और तप में लगाया गया श्रम भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि गृहस्थ धन एवं संसाधन अर्जित करने के लिए परिश्रम करता है, जबकि संयमी साधक ज्ञान, ध्यान और तप के माध्यम से आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ता है। स्वयं के श्रम से अर्जित सफलता व्यक्ति को अलग पहचान देती है।
कोई काम छोटा नहीं होता
मुनि श्री ने कहा कि सीमित साधनों से शुरुआत कर निरंतर परिश्रम के बल पर आगे बढ़ा जा सकता है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रारंभिक जीवन का संदर्भ देते हुए कहा कि कोई भी काम छोटा नहीं होता। प्रधानमंत्री कार्यालय की आधिकारिक जीवनगाथा में भी उनके परिवार की चाय की दुकान पर काम करने का उल्लेख है।
मुनिश्री ने कहा कि बुद्धिमत्ता, व्यवहार-कुशलता और श्रम के बल पर आगे बढ़ने के रास्ते खुलते हैं। व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार कार्य शुरू कर आत्मनिर्भर बनने की दिशा में प्रयास करना चाहिए।
आचार्य ज्ञानसागर जी के विद्यार्थी जीवन का प्रसंग
मुनि श्री ने आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज के विद्यार्थी जीवन का प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि ब्रह्मचारी भूरामल जी के रूप में विद्यार्थी जीवन में आर्थिक परिस्थितियां अनुकूल नहीं थीं, किंतु अध्ययन के प्रति उनकी लगन प्रबल थी।
वे अध्ययन के साथ खाली समय में गंगा घाटों पर गमछे बेचकर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे। आगे चलकर वही ब्रह्मचारी भूरामल जी मुनि दीक्षा के बाद आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज बने। मुनिश्री ने कहा कि यह प्रसंग बताता है कि अभाव लक्ष्य के प्रति समर्पण और पुरुषार्थ के मार्ग में बाधा नहीं बनता।
संग्रह नहीं, परोपकार में है मधुरता
आचार्य श्री के दोहे—‘सागर का जल खार क्यों, सरिता मीठी स्वाद…’—की व्याख्या करते हुए मुनि श्री ने संग्रह एवं परोपकार के अंतर को समझाया। उन्होंने कहा कि नदी निरंतर बहकर दूसरों की प्यास बुझाती है, जबकि केवल संग्रह करते रहने से वास्तविक संतोष नहीं मिलता।
उन्होंने कहा कि अपने श्रम से दूसरों के लिए उपयोगी बनना और उनके कल्याण में योगदान देना जीवन में मधुरता लाता है। दान और त्याग केवल धार्मिक क्रियाएं नहीं, बल्कि व्यक्ति को उदार, संवेदनशील और परोपकारी बनाने के माध्यम हैं।
श्रीफल साथी : राजीव सिंघई





