कुण्डलपुर (मप्र.)। निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कहा कि मनुष्य पर्याय पूर्व पुण्य का परिणाम है, किंतु इस जीवन की सार्थकता वर्तमान के पुरुषार्थ, संस्कार और जिम्मेदारियों के निर्वहन से होती है। उन्होंने कहा कि परिवार की परंपरा कमजोर होने पर धर्म की परंपरा भी प्रभावित होती है।

राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं क्षेत्रीय प्रचारमंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि मुनिश्री ने धर्मसभा में परिवार, संस्कार, धर्म परंपरा और जैन समाज की पहचान के विषय पर युवाओं को संबोधित किया।

आत्मनिर्भरता के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी

मुनिश्री ने कहा कि आर्थिक आत्मनिर्भरता अच्छी बात है, लेकिन इसे परिवार और जिम्मेदारियों से अलगाव का आधार नहीं बनाना चाहिए। उनके अनुसार परिवार के साथ रहने से व्यक्ति मर्यादा, व्यवस्था और दायित्वों से जुड़ा रहता है।

उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के नाम पर सभी जिम्मेदारियों से मुक्त होने की मानसिकता बढ़े तो स्वच्छंदता का भाव भी बढ़ सकता है। इसलिए युवाओं को अपनी स्वतंत्र सोच के साथ माता-पिता, परिवार और सामाजिक दायित्वों के प्रति संवेदनशील रहना चाहिए।

संस्कारों से आगे बढ़ती है धर्म परंपरा

मुनिश्री ने कहा कि त्याग और संयम की वृत्ति परिवारों के धार्मिक वातावरण और संस्कारों से विकसित होती है। परिवारों में धर्माचरण, संवाद और संस्कार का वातावरण रहेगा, तभी अगली पीढ़ी में त्यागी वृत्ति तथा धर्म के प्रति समर्पण विकसित होगा।

उन्होंने कहा कि परिवार बढ़ाने का अर्थ केवल संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि परिवार के सदस्यों को धार्मिक एवं नैतिक संस्कारों से जोड़ना भी है। पूर्व पीढ़ियों ने सीमित साधनों में भी बड़े परिवारों की जिम्मेदारियां निभाईं और संस्कारों की परंपरा को आगे बढ़ाया।

जनगणना में ‘जैन’ पहचान स्पष्ट लिखने का आह्वान

मुनिश्री ने जैन समाज से जनगणना के दौरान धर्म के कॉलम में ‘जैन’ पहचान स्पष्ट रूप से अंकित करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि अलग-अलग उपनामों के कारण समाज की वास्तविक संख्या का आकलन स्पष्ट नहीं हो पाता। धार्मिक पहचान का स्पष्ट उल्लेख समाज की जागरूकता और जिनशासन के प्रति गौरव का विषय है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन का सदुपयोग परिवार, संस्कार, धर्म और आत्मकल्याण—इन सभी के प्रति जिम्मेदारी समझकर आगे बढ़ने में है।

श्रीफल साथी : राजीव सिंघई