कुण्डलपुर। निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज के 44वें दीक्षा दिवस समारोह में मुनि श्री पवित्रसागर जी महाराज ने कहा कि आचार्य विद्यासागर महाराज द्वारा जगाई गई धार्मिक चेतना पीढ़ियों को निरंतर दिशा देती रहेगी। मुनि समतासागर महाराज के व्यक्तित्व और साधना का प्रभाव ऐसा रहा कि सांसारिक आकर्षण स्वतः फीके पड़ गए।
युवाओं में दिखते हैं संयम के संस्कार
मुनि पवित्रसागर जी महाराज ने कहा कि दशलक्षण पर्व के दौरान देश के विभिन्न आईआईटी और उच्च शिक्षण संस्थानों में अध्ययनरत अनेक विद्यार्थी शुद्ध भोजन एवं संयम का पालन कर रहे हैं। बेंगलुरु, पुणे, रुड़की, मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों में पढ़ने वाले कई युवा मैस का भोजन छोड़कर स्वयं भोजन बनाते हैं अथवा जैन परिवारों के माध्यम से शुद्ध भोजन की व्यवस्था करते हैं।
उन्होंने कहा कि अनेक विद्यार्थी इसके लिए कई किलोमीटर साइकिल से जाते हैं। यह आचार्य विद्यासागर महाराज द्वारा समाज में जगाई गई धार्मिक चेतना और संस्कारों की गहराई को दर्शाता है।
बड़े बाबा की श्रद्धा गुरु उपकार का उदाहरण
मुनिश्री ने कहा कि कुण्डलपुर के बड़े बाबा के प्रति श्रद्धा तथा धार्मिक गतिविधियों में समाज की निरंतर भागीदारी गुरु साधना के प्रभाव का उदाहरण है। श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य के अनुसार पूजा-अर्चना और धार्मिक कार्यों में योगदान देते हैं।
उन्होंने कहा कि आचार्य विद्यासागर महाराज ने बड़े बाबा को जिस प्रतिष्ठा और जनआस्था के केंद्र के रूप में स्थापित किया, वह गुरु उपकार का महत्वपूर्ण प्रसंग है।
अध्ययन और सहयोग से समृद्ध होता है संघ
मुनिश्री ने साधु-संघ की अध्ययनशीलता, आपसी संवाद और सहयोग की सराहना की। उन्होंने कहा कि कर्मकांड, रत्नकरण्डक श्रावकाचार, जैन सिद्धांत प्रवेशिका और आचार्यसार जैसे ग्रंथों पर संतों के बीच निरंतर चर्चा होती है। अध्ययन, संवाद और प्रसन्नता के साथ आगे बढ़ना संघ की साधना को समृद्ध करता है।
उन्होंने कहा कि धार्मिक आयोजनों में समय का संतुलन भी आवश्यक है, जिससे सभी संतों को अपनी बात रखने का अवसर मिले और श्रद्धालु प्रत्येक वक्ता के विचारों का सहजता से लाभ ले सकें।
गुरु आज्ञा के प्रति पूर्ण समर्पण
मुनि समतासागर जी महाराज ने कहा कि मुनि पवित्रसागर महाराज ने 1988 में दीक्षा ग्रहण की। उनकी साधना की विशेष पहचान गुरु आज्ञा के प्रति पूर्ण समर्पण है। परिस्थितियां कैसी भी रही हों, उन्होंने आचार्य विद्यासागर महाराज के निर्देशों को सर्वोपरि माना।
उन्होंने कहा कि अस्वस्थ संतों की सेवा के दौरान भी मुनि पवित्रसागर महाराज ने वैयावृत्ति एवं आहारचर्या की जिम्मेदारियां पूरी तत्परता से निभाईं। गुरु आज्ञा के प्रति यही निष्ठा साधना के पथ पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।
गुरु भक्ति और समता का भाव
मुनिश्री ने संघ की यात्राओं, चातुर्मास और तीर्थ क्षेत्रों में हुई धर्म प्रभावना का उल्लेख करते हुए कहा कि सम्मेद शिखरजी सहित अनेक तीर्थों में साधु-संतों के सान्निध्य से श्रद्धालुओं को धर्मलाभ मिला। कुण्डलपुर में भी पिछले दो माह से विभिन्न आयोजनों के माध्यम से व्यापक धर्म प्रभावना हुई।
समारोह का संचालन राष्ट्रीय कवि चंद्रसेन जैन ने किया। राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन एवं कुण्डलपुर प्रचार मंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि समारोह में देशभर से श्रद्धालु, त्यागी-व्रती एवं धर्मानुरागीजन शामिल हुए।
श्रीफल साथी : कुण्डलपुर




