कुंडलपुर (म.प्र.)। निर्यापक मुनि श्री समतासागर महाराज ने प्रातःकालीन धर्मसभा में सम्यक अभिप्राय, गुण-दृष्टि और सकारात्मक चिंतन को आत्मशुद्धि का वास्तविक मार्ग बताते हुए कहा कि व्यक्ति जैसा चिंतन करता है, उसे संसार भी वैसा ही दिखाई देता है। मन में अच्छाई और सकारात्मकता ग्रहण करने की भावना हो तो प्रत्येक व्यक्ति और परिस्थिति से प्रेरणा प्राप्त की जा सकती है।

दृष्टिकोण बदलने से बदलता है जीवन

मुनिश्री ने कहा कि संसार में प्रत्येक व्यक्ति और परिस्थिति से कुछ न कुछ श्रेष्ठ सीखा जा सकता है। इसके लिए दृष्टिकोण में परिवर्तन आवश्यक है। यदि हमारा अभिप्राय सम्यक होगा तो हम जहां भी जाएंगे, वहां गुणों को ग्रहण करेंगे, जबकि नकारात्मक सोच रखने वाला व्यक्ति हर स्थान पर कमियां खोजता रहेगा।

उन्होंने कहा कि अनेक लोग किसी स्थान पर पहुंचते ही शिकायतों का क्रम शुरू कर देते हैं। व्यवस्था, स्वच्छता, व्यवहार और छोटी-छोटी बातों में दोष दिखाई देने लगते हैं। यह प्रवृत्ति मानसिक अशांति का संकेत है। जीवन में सुख, संतोष और शांति के लिए शिकायत के स्थान पर सराहना और कृतज्ञता का भाव विकसित करना चाहिए।

सकारात्मक शब्द देते हैं शांति

मुनिश्री ने कहा कि किसी भी संबंध या कार्य की शुरुआत सकारात्मकता के साथ करनी चाहिए। यदि किसी से मिलने में विलंब हो जाए तो शिकायत के बजाय उसके धैर्य और प्रतीक्षा के लिए आभार व्यक्त करना चाहिए। सामने वाले के प्रयासों की प्रशंसा और सेवा-भाव का सम्मान करना चाहिए। सकारात्मक शब्द दूसरों के साथ स्वयं के मन को भी शांति और संतोष प्रदान करते हैं।

फूलों में सुंदरता नहीं, कांटे देखने की प्रवृत्ति

प्रवचन में मुनिश्री ने एक प्रेरक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि एक व्यक्ति बगीचे में पहुंचा, जहां रंग-बिरंगे और सुगंधित फूल खिले थे, लेकिन उसने फूलों की सुंदरता के बजाय उनके कांटों को देखा। कोयल की मधुर आवाज सुनकर भी उसके काले रंग पर ध्यान दिया। समुद्र की विशालता की जगह उसके खारेपन को देखा और चंद्रमा की शीतल चांदनी के बजाय उसके धब्बों को खोजा।

मुनिश्री ने कहा कि यही नकारात्मक दृष्टि मनुष्य को दूसरों के गुणों से वंचित कर देती है। मनुष्य को अपनी दृष्टि को निर्मल बनाकर अच्छाइयों को ग्रहण करने का प्रयास करना चाहिए।

भ्रमर की तरह गुणों का रस ग्रहण करें

मुनिश्री ने भ्रमर और मक्खी का उदाहरण देते हुए कहा कि भ्रमर बगीचे में जाकर केवल पुष्पों का मधुर रस ग्रहण करता है और आगे बढ़ जाता है, जबकि मक्खी स्वच्छ वातावरण में भी गंदगी की ओर आकर्षित होती है। मनुष्य को स्वयं तय करना है कि वह भ्रमर की तरह गुणों का रस ग्रहण करेगा या मक्खी की तरह दोषों की खोज करेगा।

आत्मनिरीक्षण ही आत्मशुद्धि का मार्ग

संत कबीर के प्रसिद्ध दोहे का उल्लेख करते हुए मुनिश्री ने कहा कि दूसरों के दोष देखने के स्थान पर अपने अवगुणों को पहचानना और उन्हें दूर करने का प्रयास करना चाहिए। दूसरों के गुणों को आत्मसात करने का संकल्प ही आत्मशुद्धि की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

उन्होंने कहा कि जहां भी गुणीजन मिलें, वहां उनके प्रति प्रमोद, सम्मान और बहुमान का भाव रखना चाहिए। विद्वान का दूसरे विद्वान के प्रति, व्यापारी का दूसरे व्यापारी की उन्नति के प्रति तथा व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति के प्रति ईर्ष्या भाव अज्ञान और अहंकार का परिणाम है।

पंच परमेष्ठी और गुरुजन गुणों की प्रतिमूर्ति

मुनिश्री ने कहा कि वास्तविक उन्नति के लिए श्रेष्ठजनों की पहचान कर उनके गुणों का आदर करना आवश्यक है। पंच परमेष्ठी एवं गुरुजन गुणों की सजीव प्रतिमूर्ति हैं। उनके प्रति श्रद्धा, विनय और प्रमोद का भाव आत्मा को निर्मल बनाता है।

गुणीजन जब एक-दूसरे का सम्मान करते हैं तो समाज में सद्भाव, सहयोग और आत्मीयता का वातावरण निर्मित होता है। सज्जनों का संग सदैव आनंद और प्रेरणा का स्रोत होता है।

9 अगस्त को मंगल कलश स्थापना समारोह

राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी एवं कुंडलपुर क्षेत्र प्रचार मंत्री जयकुमार जैन जलज ने बताया कि रविवार 9 अगस्त को दोपहर 1 बजे भव्य मंगल कलश स्थापना समारोह आयोजित किया जाएगा।

कुंडलपुर क्षेत्र कमेटी अध्यक्ष चंद्रकुमार सराफ, चातुर्मास कमेटी संयोजक इंजीनियर आरके जैन एवं समस्त पदाधिकारियों ने श्रद्धालुओं से समारोह में अधिकाधिक संख्या में उपस्थित होकर धर्मलाभ लेने की अपील की है।