कुण्डलपुर। चौरासी लाख योनियों में अनगिनत भटकाव के बाद बड़ी मुश्किल से प्राप्त हुआ मनुष्य जीवन कोई सामान्य उपलब्धि नहीं, बल्कि प्रकृति और अस्तित्व का अनमोल उपहार है। यह जीवन सीमित समय के लिए मिला है और अंततः शरीर, धन-दौलत तथा संसार का सारा वैभव यहीं छूट जाना है। इसलिए भौतिक वस्तुओं के प्रति अत्यधिक आसक्ति रखकर आत्मा को चारों ओर से जकड़ लेना जीवन के इस दुर्लभ अवसर का दुरुपयोग है। यह विचार निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने ‘लाइफ इज ए गिफ्ट—जीवन एक उपहार है’ विषय पर प्रवचन देते हुए व्यक्त किए।
हर दिन मिलते हैं 86,400 सेकंड
मुनि श्री ने कहा कि कल्पना कीजिए, कोई बैंक प्रतिदिन सुबह आपके खाते में 86,400 रुपये जमा करे और शर्त रखे कि रात 12 बजे तक खर्च न की गई पूरी राशि समाप्त हो जाएगी। तब आप एक-एक रुपये का सदुपयोग करेंगे। प्रकृति भी प्रतिदिन हमारी सांसों के खाते में 86,400 सेकंड जमा करती है, लेकिन हम यह देखने का प्रयास नहीं करते कि उस पूंजी का कितना उपयोग किया और कितना चिंता, तनाव, मोबाइल, रील्स, निंदा अथवा निरर्थक गतिविधियों में गंवा दिया।
उन्होंने कहा कि हम सुबह करोड़पति की तरह जागते हैं और रात तक अपनी पूरी पूंजी गंवाकर दिवालिया हो जाते हैं। धन की चोरी पर हम एफआईआर दर्ज कराते हैं, लेकिन समय की डकैती हमारी आंखों के सामने होती रहती है और हम खामोश रहते हैं। वक्त केवल बीत नहीं रहा, वह लगातार खत्म हो रहा है।
उपहार में अपेक्षा नहीं, भावना जरूरी
मुनि श्री ने कहा कि सच्चा उपहार केवल कोई वस्तु देना नहीं, बल्कि अहंकार से मुक्त मन, प्रेम, करुणा और कृतज्ञता का भाव है। यदि किसी को कुछ देकर बदले में आभार, सम्मान या लाभ की अपेक्षा रखी जाए तो वह उपहार नहीं, व्यापार बन जाता है। जीवन भी हमें इसलिए नहीं मिला कि हम केवल संग्रह करते रहें, बल्कि इसलिए मिला है कि हम इसे दूसरों के लिए उपयोगी बनाएं।
चतुर्विध संघ की सेवा और दान
उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन रूपी इस उपहार का सदुपयोग चतुर्विध संघ की सेवा और चार प्रकार के दान के माध्यम से किया जा सकता है। मुनि, आर्यिका, श्रावक और श्राविका धर्म के चतुर्विध संघ हैं। आहार, औषधि, उपकरण एवं ज्ञानोपयोगी सामग्री तथा वसति आदि की व्यवस्था के माध्यम से सेवा की जा सकती है।
दान में देने वाला केवल सामने वाले पर उपकार नहीं करता, बल्कि अपने भीतर के लोभ, अहंकार और परिग्रह का त्याग करता है, जबकि पाने वाला करुणा, कृतज्ञता और वात्सल्य के भाव ग्रहण करता है। इस प्रकार दान दोनों के जीवन को भीतर से समृद्ध करता है।
परस्परोपग्रहो जीवानाम् का संदेश
मुनि श्री ने कहा कि उपहार केवल मनुष्य के बीच का व्यवहार नहीं, बल्कि पूरे ब्रह्मांड के सह-अस्तित्व का नियम है। प्रकृति हमें हवा, पानी और मिट्टी देती है और हमारा दायित्व है कि हम समाज तथा अन्य जीवों के अस्तित्व की रक्षा में अपना योगदान दें। जैन दर्शन का सूत्र ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’ इसी सत्य को प्रतिपादित करता है कि जीव परस्पर एक-दूसरे के सहयोग और उपकार के लिए हैं।
चार गुण बनाते हैं जीवन को सार्थक
उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन को वास्तविक उपहार बनाने वाले चार महत्वपूर्ण गुण हैं—साक्षी भाव, भाव परिवर्तन की क्षमता, विवेक एवं प्रायश्चित की क्षमता और अनंत करुणा-सहानुभूति। ये गुण मनुष्य को अपनी परिस्थितियों का दास बनने से बचाते हैं और आत्मोन्नति का मार्ग खोलते हैं। नर से नारायण और निरंजन बनने का अवसर इसी मनुष्य पर्याय में प्राप्त होता है, इसलिए इसे अत्यंत दुर्लभ माना गया है।
चिंतामणि रत्न जैसा दुर्लभ जीवन
चिंतामणि रत्न का उदाहरण देते हुए मुनि श्री ने कहा कि यदि किसी अंधे व्यक्ति के हाथ में अमूल्य चिंतामणि रत्न आ जाए और वह उसे साधारण पत्थर समझकर पानी में फेंक दे तो वास्तविकता पता चलने के बाद उसके पास केवल पछतावा रह जाएगा। हमारी स्थिति भी ऐसी ही है। मनुष्य जीवन रूपी चिंतामणि रत्न हमारे हाथ में है, लेकिन हम उसकी क्षमता पहचानने के बजाय उसे मनोरंजन और भौतिक मोह में गंवा रहे हैं।
मृत्यु को कल पर न टालें
मुनि श्री ने चेताया कि मनुष्य जीवन मिलने के बाद भी हम ऐसे जीते हैं जैसे अमर होकर आए हों। अमरता का भ्रम जीवन को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाता है। मृत्यु कोई दूर की घटना नहीं; समय हर सेकंड एक सांस के रूप में हमारे जीवन से अपनी किस्त वसूल रहा है। इसलिए आत्मकल्याण को कल पर टालना जीवन के साथ सबसे बड़ा अन्याय है।
असफलता अंत नहीं
उन्होंने कहा कि दूसरा बड़ा अवरोध असफलता का डर है। व्यवसाय में नुकसान, किसी का अस्वीकार कर देना या अपेक्षित परिणाम न मिलना जीवन समाप्त करने का कारण नहीं हो सकता। असफलता अंत नहीं, पुनः प्रयास का अवसर है। जीवन के प्रति सम्मान यही है कि गिरने के बाद उठें और प्रयास दर प्रयास आगे बढ़ते रहें। किसी से तुलना करने के बजाय स्वयं को कल से बेहतर बनाना ही वास्तविक सफलता है।
दूसरों के लिए जीवन बने उपहार
मुनि श्री ने कहा कि किसी रोते हुए व्यक्ति को हंसाकर जो आत्मिक आनंद मिलता है, वह दुनिया की किसी स्क्रीन पर नहीं मिल सकता। इसलिए जीवन की सफलता अधिक से अधिक संग्रह करने में नहीं, बल्कि जीवन को दूसरों के लिए उपहार बना देने में है।
लाइफ सीरीज में प्रवचन श्रृंखला
राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं कुण्डलपुर क्षेत्र प्रचारमंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि प्रातःकाल बड़े बाबा के दरबार में शांतिधारा मुनि श्री के मुखारविंद से संपन्न हुई। ‘लाइफ सीरीज’ के अंतर्गत जीवन के विभिन्न आयामों पर प्रवचन की श्रृंखला जारी है। इस अवसर पर मुनि श्री पवित्रसागर महाराज सहित समस्त ऐलक, क्षुल्लक महाराज एवं पूरा संघ उपस्थित रहा।




