कुंभोज (महाराष्ट्र)। दशलक्षण महापर्व के दौरान कुंभोज निवासी विश्वगुप्त ‘प्रेम’ चंद्रगुप्त चौगुले ने छह निर्जल उपवास की तप-साधना पूर्ण की। 19 सितंबर को आचार्य श्री चंद्रप्रभ सागर महाराज के सान्निध्य में उन्होंने पारणा किया।
विश्वगुप्त चौगुले जगद्गुरु, भारत गौरव, गणाधिपति गणधराचार्य श्री कुंथुसागर महाराज के भक्त हैं। वे त्यागी सेवा, आहारदान, वैयावृत्ति, तीर्थ वंदना, षोडशकारण एवं दशलक्षण की आराधना के साथ पूजन-अभिषेक जैसी धार्मिक क्रियाओं में सक्रिय सहभागिता करते हैं।
छह निर्जल उपवास से की तप आराधना
दशलक्षण महापर्व में उपवास को केवल आहार के त्याग तक सीमित न मानकर मन, वचन और कर्म की शुद्धि से जोड़कर देखा जाता है। इसी भावना के साथ विश्वगुप्त चौगुले ने छह निर्जल उपवास कर तप और संयम की आराधना की।
तप पूर्ण होने पर आचार्य चंद्रप्रभ सागर महाराज के सान्निध्य में पारणा संपन्न हुआ।
दस धर्मों की आराधना का पर्व
दशलक्षण महापर्व में उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य—इन दस धर्मों की क्रमशः आराधना की जाती है।
इस दौरान श्रद्धालु अपनी क्षमता के अनुसार उपवास, एकासन, पूजन, अभिषेक, स्वाध्याय, ध्यान और प्रवचन श्रवण के माध्यम से धर्म-साधना करते हैं।
चार कषायों से मुक्त होने की प्रेरणा
दशलक्षण के प्रारंभिक चार धर्म आत्मनिरीक्षण की विशेष प्रेरणा देते हैं। उत्तम क्षमा क्रोध, उत्तम मार्दव मान, उत्तम आर्जव माया और उत्तम शौच लोभ पर नियंत्रण एवं उनके त्याग की भावना से जुड़े हैं।
क्रोध, मान, माया और लोभ जैसी कषायों को कम करते हुए आत्मा के स्वाभाविक गुणों की ओर बढ़ना दशलक्षण की साधना का प्रमुख उद्देश्य माना गया है।
सत्य से संयम और आगे तप की यात्रा
मन की शुद्धि के बाद उत्तम सत्य और फिर उत्तम संयम की आराधना आती है। संयम के बाद उत्तम तप के माध्यम से साधक आत्मशुद्धि की दिशा में आगे बढ़ता है।
इसीलिए पर्युषण-दशलक्षण महापर्व को आत्मचिंतन, संयम, तप और त्याग के माध्यम से आत्मकल्याण की ओर बढ़ने का पर्व माना जाता है।




