श्रवणबेलगोला। आज स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और लगातार स्क्रीन देखने की आदत जीवन का हिस्सा बन गई है। काम से लेकर मनोरंजन तक व्यक्ति का काफी समय मोबाइल और इंटरनेट पर बीत रहा है। ऐसे समय में जैन दर्शन की प्राचीन साधनाएं मन को एकाग्र करने और स्क्रीन पर निर्भरता कम करने का मार्ग दिखा सकती हैं।

श्रवणबेलगोला जैन मठ के पीठाधीश आगम कीर्ति भट्टारक स्वामी ने एक बातचीत में आधुनिक जीवन, मोबाइल के बढ़ते उपयोग, बच्चों में स्क्रीन की आदत, ध्यान और जैन साधना के साथ-साथ अहिंसा और अनेकांतवाद की प्रासंगिकता पर विचार साझा किए।

तकनीक से दूरी नहीं, सही उपयोग जरूरी

भट्टारक स्वामी के अनुसार समय के साथ आगे बढ़ना जरूरी है। तकनीक को पूरी तरह नकारना समाधान नहीं है, बल्कि उसका उपयोग आवश्यकता के अनुसार किया जाना चाहिए।

उन्होंने श्रुत ज्ञान की परंपरा का उदाहरण देते हुए बताया कि पहले गुरु से शिष्य तक मौखिक रूप से ज्ञान पहुंचता था। इसे श्रुत ज्ञान कहा जाता था। समय के साथ आचार्यों ने अनुभव किया कि मौखिक रूप से कही गई बात का पूरा हिस्सा आगे नहीं पहुंच पाता। इसी कारण आचार्य धरसेन सहित आचार्यों ने शिक्षाओं को लिखित रूप देने की दिशा में कार्य किया और शास्त्रों का संरक्षण संभव हुआ।

आज पुस्तकों की जगह मोबाइल और इंटरनेट ने काफी हद तक ले ली है। लेकिन तकनीक का सकारात्मक उपयोग भी हो सकता है। उदाहरण के लिए यात्रा के दौरान कई शास्त्रों को साथ ले जाना कठिन होता है, जबकि एक टैबलेट में अनेक ग्रंथ रखे जा सकते हैं। इसलिए तकनीक से पूरी तरह दूर होने के बजाय उसका विवेकपूर्ण उपयोग करना चाहिए।

घर ही पहली पाठशाला

स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करने में परिवार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। कन्नड़ की एक कहावत का उल्लेख करते हुए स्वामीजी ने कहा—घर पहली पाठशाला है और मां पहली शिक्षिका।

पहले माताएं बच्चों को चंद्रमा दिखाकर या कहानियां सुनाकर भोजन कराती थीं। आज कई माता-पिता बच्चे को शांत रखने या भोजन कराने के लिए मोबाइल या टैबलेट हाथ में दे देते हैं।

बच्चा अपने माता-पिता को देखकर सीखता है। यदि माता-पिता स्वयं लगातार मोबाइल का उपयोग करेंगे, तो बच्चे से मोबाइल से दूरी बनाने की अपेक्षा करना कठिन होगा। इसलिए बच्चों के स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करने की शुरुआत माता-पिता को स्वयं से करनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि घर में माता-पिता द्वारा दिया गया मार्गदर्शन और अनुशासन किसी भी उपदेश से अधिक प्रभावी हो सकता है। साधु-संत हजार लोगों को प्रवचन दें, लेकिन कुछ समय बाद बहुत कम बातें याद रहती हैं, क्योंकि लोगों का ध्यान लगातार दूसरी चीजों की ओर भटकता रहता है।

मन की एकाग्रता के लिए सामायिक और स्वाध्याय

कामकाजी जीवन में व्यक्ति का मन अनेक दिशाओं में दौड़ता रहता है। ऐसे में जैन परंपरा मन को केंद्रित करने के लिए कई साधन बताती है।

सामायिक में भक्ति, शास्त्र-पाठ और आत्मचिंतन शामिल हैं। इसके साथ स्वाध्याय व्यक्ति को स्वयं के बारे में विचार करने का अवसर देता है—मैं कौन हूं, आत्मा इस शरीर में क्यों आई है और आगे उसका लक्ष्य क्या है?

इसी प्रकार कायोत्सर्ग में मंत्र-जप और ध्यान के माध्यम से शरीर से अलग आत्मस्वरूप पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।

शांत वातावरण में ध्यान का महत्व

भट्टारक स्वामी के अनुसार ध्यान के लिए वातावरण भी महत्वपूर्ण है। घर में मशीनों और अन्य गतिविधियों से उत्पन्न होने वाला शोर मन को विचलित कर सकता है। नदी के किनारे या शांत प्राकृतिक स्थान पर बैठने से वातावरण अधिक शांत मिलता है।

नदी की धारा की तरह विचारों को भी बहने देना चाहिए। ध्यान करते समय विचार आएंगे, लेकिन उन्हें पकड़कर बैठने के बजाय उन्हें आने-जाने देना चाहिए।

उन्होंने कहा कि घर, पार्क, जंगल या नदी किनारे की शांति से भी अधिक गहरी शांति भगवान या गुरु के चरणों में बैठने से प्राप्त हो सकती है।

अहिंसा और अनेकांतवाद आज भी प्रासंगिक

दुनिया के विभिन्न हिस्सों में चल रहे संघर्षों के बीच जैन धर्म के अहिंसा सिद्धांत की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। लेकिन जैन दर्शन केवल अहिंसा की बात नहीं करता, बल्कि अनेकांतवाद का सिद्धांत भी देता है।

अनेकांतवाद का अर्थ है कि किसी व्यक्ति या विषय को केवल एक दृष्टिकोण से नहीं देखा जा सकता। एक व्यक्ति अपनी पत्नी के लिए पति है, अपने बच्चे के लिए पिता है और अपनी मां के लिए पुत्र है। व्यक्ति वही है, लेकिन संबंध और दृष्टिकोण बदलते ही उसकी पहचान का संदर्भ बदल जाता है।

इसी प्रकार हमें दूसरे व्यक्ति, समाज, राष्ट्र, संस्कृति और धर्म के दृष्टिकोण को भी समझने का प्रयास करना चाहिए। केवल अपनी बात को सही मानकर दूसरे के दृष्टिकोण को नकारना अनेकांत की भावना नहीं है।

हर जीव में आत्मा

जैन दर्शन के अनुसार जीवन केवल मनुष्य तक सीमित नहीं है। चींटी, पशु, पक्षी और अन्य जीवों में भी आत्मा का अस्तित्व माना गया है। प्रत्येक आत्मा में परमात्मा बनने की क्षमता है।

इसलिए सभी जीवों के प्रति समान दृष्टि, सम्मान और मैत्री का भाव रखना चाहिए। अनेकांतवाद हमें दूसरों के दृष्टिकोण को समझना सिखाता है, जबकि अहिंसा सभी जीवों के प्रति करुणा और सम्मान की भावना विकसित करती है।

आज जब मोबाइल और डिजिटल दुनिया ने जीवन को सुविधाजनक बनाने के साथ-साथ मन की एकाग्रता के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं, तब जैन दर्शन की सामायिक, स्वाध्याय, कायोत्सर्ग, ध्यान, अहिंसा और अनेकांतवाद जैसी शिक्षाएं आधुनिक जीवन में संतुलन बनाने की दिशा दिखाती हैं।

स्रोत : टाइम्स ऑफ इंडिया (Times of India), 19 अगस्त 2026

मूल लेख का शीर्षक : How Ancient Jain Practices Can Cure Modern Screen Addiction: Interview with Bhattarakaswami of Shravanabelagola

साक्षात्कार : सोनल श्रीवास्तव

प्रकाशन : Times of India

दिनांक : 19 अगस्त 2026