बांसवाड़ा। अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में वैज्ञानिक धर्माचार्य कनकनंदी गुरुदेव के सुशिष्य मुनि श्री सुविज्ञसागर जी महाराज ने आचार्यश्री द्वारा रचित कविता ‘देव दर्शन विधि’ की समीक्षा करते हुए जिनेंद्र दर्शन की मर्यादा, भाव-शुद्धि और आत्मकल्याणकारी महत्व पर प्रकाश डाला।

मुनि श्री ने कहा कि जैन परंपरा में देव दर्शन का भाव जागृत होना अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। उन्होंने धार्मिक मान्यता के अनुसार देव दर्शन के भाव, मंदिर गमन और श्रद्धापूर्वक जिनेंद्र दर्शन से मिलने वाले पुण्यफल का उल्लेख करते हुए इसे आत्मशुद्धि का माध्यम बताया।

शुद्धि और सावधानी के साथ मंदिर गमन

मुनि श्री ने कहा कि स्नान कर शुद्ध होकर, स्वच्छ वस्त्र धारण कर तथा जीवों की रक्षा का ध्यान रखते हुए मंदिर जाना चाहिए। मार्ग में प्रभु स्मरण और स्तुति पाठ करते हुए शांत एवं श्रद्धापूर्ण भाव बनाए रखना चाहिए।

मंदिर पहुंचकर प्रासुक जल से चरण प्रक्षालन, मंदिर की परिक्रमा और विनयपूर्वक प्रवेश करने की परंपरा बताई गई। उन्होंने कहा कि गर्भगृह के समीप पंच नमस्कार मंत्र का जाप करते हुए श्रद्धा से जिनेंद्र भगवान के दर्शन करने चाहिए।

स्व-दर्शन और गुणानुवाद का संदेश

मुनि श्री ने कहा कि जिनेंद्र भगवान के दर्शन के समय केवल बाहरी दर्शन तक सीमित न रहकर आत्मा के स्वरूप का चिंतन करना चाहिए। भगवान के गुणों का स्मरण कर अपने भीतर भी उन्हीं गुणों को विकसित करने का भाव रखना चाहिए।

उन्होंने कहा कि संसार के बंधनों से मुक्त होकर आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने की भावना, तत्वचर्चा, स्वाध्याय और ध्यान से दर्शन की सार्थकता बढ़ती है।

साधु-सान्निध्य और वैयावृत्ति की प्रेरणा

मुनि श्री ने कहा कि मंदिर में साधु-संतों का सान्निध्य मिले तो उनके प्रवचनों से ज्ञानार्जन करना चाहिए। उनकी सेवा, वैयावृत्ति तथा आहारदान जैसे कार्यों से श्रद्धा और विनय के भाव विकसित होते हैं।

उन्होंने मंदिर जाते समय फैशन, व्यसन, अहंकार, मायाचारी और कुध्यान जैसे भावों का त्याग कर समता तथा शांति का भाव धारण करने की प्रेरणा दी।

संकीर्णता से बचने का आह्वान

मुनि श्री ने कहा कि संकीर्ण स्वार्थ, प्रदर्शन, कषाय भाव, भेदभाव और रूढ़ियों के कारण जिनेंद्र दर्शन का अपेक्षित शुभ परिणाम प्राप्त नहीं होता। देव दर्शन को आत्मशुद्धि, धर्मध्यान और मोक्षमार्ग की दिशा में प्रेरक बनाने के लिए निर्मल भाव आवश्यक हैं।

श्रीफल साथी : अजीत कोठिया डडूका, बांसवाड़ा