अयोध्या। गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के शिष्य संघस्थ बा. ब्र. डॉ. जीवनप्रकाश जैन, राष्ट्रीय अध्यक्ष, अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद ने कहा कि भारतगौरव गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी अयोध्या तीर्थ के विकास के लिए सन् 1994 से निरंतर कटिबद्ध रही हैं। उनके अनुसार माताजी का अयोध्या से संबंध केवल तीर्थ-सेवा का नहीं, बल्कि बचपन से जुड़ी श्रद्धा, साधना और समर्पण का है।

टिकैतनगर में हुआ जन्म

डॉ. जैन ने बताया कि गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का जन्म अयोध्या से लगभग 70 किलोमीटर दूर टिकैतनगर, बाराबंकी (उप्र) में आश्विन शुक्ल पूर्णिमा, शरद पूर्णिमा के दिन 22 अक्टूबर 1934 को हुआ था। उनके पिता का नाम श्री छोटेलाल तथा माता का नाम श्रीमती मोहिनी देवी था।

उन्होंने कहा कि बचपन से ही कुमारी मैना के मन में वैराग्य के भाव प्रबल थे। माता-पिता के साथ उनका अयोध्या तीर्थ दर्शन के लिए आगमन होता रहा, जिससे इस पावन भूमि के प्रति उनकी श्रद्धा और आत्मीयता गहरी होती गई।

अयोध्या में प्रतिष्ठा महोत्सव से जुड़ी स्मृतियां

डॉ. जैन ने बताया कि आचार्यरत्न श्री देशभूषण जी महाराज के सान्निध्य में सन् 1952 में अयोध्या के कटरा स्थित दिगंबर जैन मंदिर में भगवान आदिनाथ, भरत और बाहुबली की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा का आयोजन हुआ था। इस महोत्सव में कुमारी मैना को श्रीदेवी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

इसके बाद कुमारी मैना ने शरद पूर्णिमा के दिन सन् 1952 में आचार्य श्री देशभूषण जी महाराज के समक्ष आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत, सप्तम प्रतिमा के व्रत तथा गृहत्याग का नियम अंगीकार किया। सन् 1953 में उन्हें आचार्यरत्न श्री देशभूषण जी महाराज से क्षुल्लिका दीक्षा मिली और ‘वीरमती’ नाम प्राप्त हुआ। आगे सन् 1956 में माधोराजपुरा (राजस्थान) में प्रथम पट्टाचार्य श्री वीरसागर जी महाराज के करकमलों से आर्यिका दीक्षा लेकर वे ‘ज्ञानमती’ नाम से विभूषित हुईं।

शांतिसागर परंपरा की महान धरोहर

डॉ. जैन ने कहा कि गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने बीसवीं सदी के प्रथम आचार्य चारित्रचक्रवर्ती श्री शांतिसागर जी महाराज के जीवनकाल में तीन बार उनके दर्शन किए तथा उनकी आज्ञा से उसी परंपरा के प्रथम पट्टाचार्य श्री वीरसागर जी महाराज से दीक्षा प्राप्त की। इस प्रकार वे आचार्य शांतिसागर परंपरा की महान धरोहर बनीं।

अयोध्या से सतत संपर्क और साधना

उन्होंने बताया कि सन् 1963 में सम्मेदशिखर जी की यात्रा के दौरान भी माताजी ने अयोध्या तीर्थ के दर्शन किए। सन् 1965 में आचार्य श्री देशभूषण जी महाराज द्वारा रायगंज में 31 फुट ऊंची भगवान ऋषभदेव प्रतिमा की प्रतिष्ठा के समय माताजी श्रवणबेलगोला में विराजमान थीं, फिर भी अयोध्या तीर्थ की गतिविधियों से उनका सतत संपर्क बना रहा।

कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी, धनतेरस 23 अक्टूबर 1992 को जंबूद्वीप-हस्तिनापुर तीर्थ में सामायिक के दौरान सुमेरु पर्वत का ध्यान करते हुए माताजी के मन में अयोध्या में भगवान ऋषभदेव के महामस्तकाभिषेक का भाव जागृत हुआ।

वर्षायोग से मिली तीर्थ-सेवा को नई दिशा

फाल्गुन कृष्ण पंचमी, 11 फरवरी 1993 को माताजी संघ सहित विहार पर निकलीं और आषाढ़ कृष्ण द्वादशी, 16 जून 1993 को अयोध्या पहुंचीं। उनके प्रवेश से अयोध्या तीर्थक्षेत्र कमेटी तथा अवध क्षेत्र के श्रद्धालुओं में हर्ष का वातावरण रहा। सन् 1993 का वर्षायोग भी अयोध्या में संपन्न हुआ।

डॉ. जीवनप्रकाश जैन ने कहा कि गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से अयोध्या जैन तीर्थ के संरक्षण, विकास और धार्मिक प्रभावना को निरंतर नई ऊर्जा मिलती रही है।