इंदौर। जहां पुण्य का प्रवाह होता है, वहीं ऐसे दिव्य योग बनते हैं। आगामी 16 दिसंबर को जयपुर की पावन धरा पर एक ऐसा ऐतिहासिक क्षण आने वाला है, जो जिनशासन के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। पट्टाचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज ससंघ के मंगल सान्निध्य,मुनिश्री आदित्य सागर जी ससंघ के करकमलों से भव्य जैनेश्वरी दीक्षा धारण करने जा रहे तीन भावी श्रमण बाल ब्रह्मचारी अतिशय भैया जी, बाल ब्रह्मचारी विशाल भैया जी, बाल ब्रह्मचारी रोहित भैया जी दीक्षा से पूर्व पुण्यार्जन और गुरु आशीर्वाद की श्रृंखला में कोटा नगर की पावन दादाबाड़ी में निर्यापक श्रमण श्री 108 योग सागर जी मुनिराज संसघ के दर्शनार्थ पहुँचे।धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि तीनों भावी मुनिराज श्वेत वस्त्रों में, गले में पुष्पमाला धारण कर हाथ जोड़कर विनयपूर्वक खड़े हैं। साथ में एक और ब्रह्मचारी भाई भी उपस्थित है। सामने तख्त पर विराजमान हैं। निर्यापक श्रमण योग सागर जी जो शास्त्रों से घिरे हुए अपने कर कमलों से इन भावी मुनियों को निहार रहे हैं। यह दृश्य अत्यंत वात्सल्यपूर्ण और मनोहारी है। तीनों भाइयों ने निर्यापक श्रमण जी के चरणों में श्रीफल समर्पित कर उनका मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया।

निर्यापक श्रमण ने दिया वात्सल्यपूर्ण आशीर्वाद

निर्यापक श्रमण ने श्रमण संस्कृति के इन भावी ध्वजवाहकों को प्रसन्नतापूर्वक अपना मंगल आशीर्वाद एवं वात्सल्यपूर्ण स्नेह प्रदान किया। उन्होंने कहा- तुम तीनों का यह वैराग्य भाव उत्तम है। गुरु आदित्य सागर जी के सान्निध्य में तुम्हारी यह दीक्षा जिनशासन की प्रभावना को बढ़ाने वाली होगी। मेरा मंगल आशीर्वाद सदैव तुम्हारे साथ है। निःसंदेह, यह मिलन केवल एक औपचारिक भेंट नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य परम्परा के अटूट बंधन का प्रतीक है। एक ओर विशुद्ध सागर जी और आदित्य सागर जी के पट्टशिष्य बनने जा रहे हैं तो दूसरी ओर योग सागर जी जैसे तपस्वी मुनिराज का आशीर्वाद यह दुर्लभ संयोग कई जन्मों के पुण्य से बनता है। निःसंदेह, 16 दिसंबर को जयपुर, राजस्थान की पावन धरा पर एक ऐसा ऐतिहासिक अध्याय लिखा जाएगा, जो आने वाली अनेक पीढ़ियों को गौरवान्वित करेगा तथा जिनशासन की प्रभावना और उत्कर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। भारत वर्षीय सकल जैन समाज में इस दीक्षा को लेकर अत्यंत उत्साह है।