दिल्ली। पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज कहते हैं कि कैसी है आत्मा! विचारों के अनुसार ही आचरण होता है। विचारों पर ही आचार निर्धारित होते हैं। व्यक्ति के जैसे-जैसे विचार होते हैं, वह वैसा-वैसा आचरण करता है। व्यक्ति के आचरण से ही उसके आंतरिक विचारों का बोध होता है। सर्वप्रथम व्यक्ति को अपने विचारों को ही संभालना चाहिए। विचार संभल गए तो आचरण स्वयं ही संभल जाएगा।

विचार संभालो

अहो! मित्रों! विचार ही हमें उठाते हैं और विचार ही गिराते हैं। विचारों से पतन होता है। विचारों से ही मानव-महामानव (भगवान) बनता है। प्रायः के माध्यम से ही विचारों की अभिव्यक्ति होती है। जिसकी भाषा कड़वी, उसका अंतर्मन कितना विकृत होगा! विचार सुरक्षित होंगे तभी धर्म, संस्कृति सुरक्षित रह सकती है। जगत् में विकास चाहिए तो विचारों में विशुद्धि बढ़ाना चाहिए। प्रशस्त मुख-मुद्रा के साथ आंतरिक विचार भी पवित्र होने चाहिए।

विचार आचरण के जनक

बुद्धि की विकृति, विचारों की विकृति ही प्रकृति के विकृत विकार उत्पन्न करती है। विचार पवित्र होंगे तो विकार प्रभावित नहीं कर पायेंगे। तन-मन संभालो, विचारों को संभालो। विचार ही हमें दिशा देते हैं। विचारों पर ही हमारा भविष्य व जीवन-धारा निर्धारित होती है। श्रेष्ठ-से-श्रेष्ठ विचार करो। अच्छे-से-अच्छे कार्य करो। आपके विचार और आचार से ही आपकी पहचान होती है। जन-जन के विचार पवित्र रहें तो आचरण अपने-आप सुधर जायेगा। विचारों की नींव पर ही आचार का भवन खड़ा होता है। विवेकशील विचार श्रेष्ठ-आचार को जन्म देते हैं।

विचार साम्यता से मैत्री

अहो! मुमुक्षु! विचारों की विशालता ही विश्व-प्रसिद्ध बनाती है। विचारों से एकता-अखंडता स्थापित होती है। जहाँ-जहाँ विचारों में साम्यता होगी, वहीं मैत्री संभव है। विचारों का वैषम्य ही विघटन को जन्म देता है। विचारों से ही बंध होता है, विचारों से ही निर्बंध हुआ जाता है। विचार ही गिराते हैं, विचार ही उठाते हैं। विचार ही भव-भव में भ्रमाते हैं। पवित्र विचार सुखद हैं, अपवित्र विचार दुःख के कारण हैं।

स्वयं को सँभालो

संबंध बनाने में समय लगता है, परंतु क्षण-भर में टूट जाते हैं। फसल उगाने में समय लगता है, कोई खलिहान में आग लगा दे तो अल्प-समय में जलकर नष्ट हो जाते हैं। एक भवन बनाने में धन व समय लगता है, परंतु भूकंप आ जाए तो सब तहस-नहस हो जाता है। घर में विवाद हो जाए तो पड़ोस में सुनाने मत जाना। घर की लड़ाई तो शांत हो जाएगी, परंतु पड़ोसी घर-घर जाकर सुनाएगा। स्वयं को सँभालो।

जैसी सी.डी. लगाओगे, वैसी आवाज आएगी

आप जैसा भरोगे, वैसा ही निकलेगा। केतली में चाय भरोगे तो चाय निकलेगी। जिनवाणी सुनोगे तो जिनवाणी निकलेगी। बीज अनुसार ही फलता होगा। जो सी.डी. में होगा, वही तो आवाज आएगी। अच्छी संगति करोगे, अच्छे बनोगे।