जैन धर्म दर्शन में दीपावली का त्योहार मुख्य रूप से भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण (मोक्ष) दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन से जुड़ी मुख्य बातें इस प्रकार हैं:-

भगवान महावीर का निर्वाण: कार्तिक मास की अमावस्या की सुबह (चतुर्दशी के अंतिम प्रहर में) जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी को बिहार के पावापुरी में मोक्ष (निर्वाण) की प्राप्ति हुई थी।

गौतम गणधर को केवल ज्ञान: इसी अमावस्या की संध्या/रात्रि को भगवान महावीर के प्रमुख शिष्य, गणधर गौतम स्वामी को 'केवल ज्ञान' (सर्वोच्च ज्ञान) की प्राप्ति हुई थी। दीपावली सिर्फ दीपों का नहीं, अंतस के उजास का पर्व है। बाहर की रोशनी से ज्यादा भीतर के प्रकाश का पर्व है। कहा भी गया है रवि शशि से तेज है तुझ में दिव्य प्रकाश । हम घरों में दीये जलाते हैं, पर क्या मन का अंधेरा मिटा पाते हैं। जब तक अज्ञान रूपी अंधकार नहीं हटेगा तब तक ज्ञान रूपी दीपक नहीं जलेगा।

चलो गरीबों के साथ दिवाली मनाएं

दीपोत्सव आया है द्वार, खुशियों की लेकर बहार। पर यह खुशी तब तक अधूरी है जब तक गरीबों के घर में अंधेरा है। चलो गरीबों के साथ मनाएं, उनके घर भी दीप जलाएं।कुछ नए कपड़े ओर मिठाई देकर उनके चेहरे पर भी खुशी चमक देख ले। एक दीया किसी वंचित के घर जले तो ही दीवाली सार्थक है। एक दीप ऐसा जलाएं जो अहंकार को जलाए, जो ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, लोभ, मोह, माया एवं अंधकार मिटाए और ज्ञान ओर प्रेम का उजियारा फैलाए। यही सच्ची दीपावली की पूजा आराधना भक्ति है।

यह प्रकाश की अंधकार पर विजय का पर्व

बड़ी विडंबना है आज इसे 'फेस्टिवल ऑफ लाइट्स' कहा जाता है, पर यह केवल रोशनी का उत्सव नहीं, संस्कारों की रोशनी है। यह राम के वनवास से लौटने की खुशी, यह प्रकाश की अंधकार पर विजय है। आओ इस दीवाली पर प्रण लें कि अपने अर्थ का उपयोग परमार्थ में करें। भारत मां की पुण्य धरा से यही संदेश दें, हर दिल में एक दीप प्यार का धरें। जब भीतर प्रेम का दीप जलेगा, तभी बाहर का दीपोत्सव सार्थक होगा।