इंदौर। श्रमण संस्कृति के महामहिम आचार्य विशुद्ध सागर जी महाराज से दीक्षा ग्रहण करने जा रहे पांच दीक्षार्थियों को तीर्थ स्वरूप आदिनाथ जिनालय, छत्रपति नगर में चातुर्मासरत परम पूज्य निर्यापक मुनि श्री 108 सुधासागर जी महाराज का मंगल आशीर्वाद प्राप्त हुआ। इस अवसर पर गुरु-शिष्य परंपरा का भावपूर्ण दृश्य देखने को मिला।

सिर पर रखा वात्सल्य का हाथ

मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ने एक-एक कर पांचों दीक्षार्थियों के सिर पर स्नेहपूर्वक हाथ रखकर उन्हें धर्म, संयम और साधना के मार्ग पर अडिग रहने की प्रेरणा दी। गुरुदेव का वात्सल्य देखकर कुछ दीक्षार्थी भावविभोर हो गए और उनके चरणों में झुक गए। गुरुदेव ने उन्हें उठाकर पुनः आशीर्वाद प्रदान किया।

दीक्षा का मार्ग साधना का मार्ग

गुरुदेव ने दीक्षार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि दीक्षा का मार्ग कठिन है, लेकिन गुरु का आशीर्वाद, आत्मबल और दृढ़ साधना हर बाधा को पार करने की शक्ति प्रदान करती है। उन्होंने धर्म और संयम के मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ने की भावना जागृत की।

पांचों दीक्षार्थियों ने किया पाद प्रक्षालन

इस अवसर पर पांचों दीक्षार्थी भाइयों ने मुनि श्री सुधासागर जी महाराज का पाद प्रक्षालन कर गुरु के प्रति अपनी श्रद्धा एवं समर्पण व्यक्त किया। पूरे वातावरण में शांति, श्रद्धा और वात्सल्य का भाव दिखाई दिया।

श्रावक-श्राविकाओं ने माना सौभाग्य

कार्यक्रम में अक्षय भैया, डॉ. जैनेन्द्र जैन, राकेश शाह, कमलेश, नीना पाहड़िया, मुक्ता राजेश जैन दद्दू, अतिशय जैन सहित अनेक श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे। सभी ने इस दुर्लभ एवं भावपूर्ण क्षण को अपने लिए सौभाग्यशाली माना और “नमोस्तु शासन जयवंत हो” के जयघोष से वातावरण गुंजायमान कर दिया।

गुरु कृपा और शिष्य समर्पण का संगम

जैन समाज के वरिष्ठ समाजसेवी डॉ. जैनेन्द्र जैन ने कहा कि यह प्रसंग गुरु की कृपा और शिष्य की समर्पण भावना का जीवंत उदाहरण है। जब गुरु का हाथ शिष्य के सिर पर होता है, तो उसका जीवन धन्य हो जाता है।