दिल्ली। ऋषभ बिहार स्थित ऋषमोदय में विराजित दिगम्बर जैन पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने धर्मसभा में आत्मकल्याण और चारित्र निर्माण से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर मार्गदर्शन दिया। उन्होंने शब्दज्ञान की अपेक्षा आत्मज्ञान, धन की अपेक्षा धर्म तथा बाहरी चित्र की अपेक्षा पवित्र चारित्र को श्रेष्ठ बताया।
शब्दज्ञान के साथ आत्मज्ञान जरूरी
पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने कहा कि केवल शब्दज्ञान पर्याप्त नहीं है। यदि ज्ञान के साथ आचरण नहीं है तो वह कोरा ज्ञान व्यर्थ है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि गधे की पीठ पर चंदन लदा हो तो उसकी सुगंध का उपयोग कोई दूसरा करता है, लेकिन गधे को उसका लाभ नहीं मिलता।
उन्होंने कहा कि शब्दज्ञान और आत्मज्ञान अलग हैं। तत्त्व चर्चा तभी सार्थक है, जब उसके साथ आचरण की पवित्रता और आत्मज्ञान जुड़ा हो। साधक को संयम, उपवास और साधना के साथ आंतरिक जुड़ाव भी रखना चाहिए।
संस्कार बनाते हैं व्यक्तित्व
आचार्यश्री ने कहा कि संस्कार ही सिद्धि की ओर ले जाने वाला सोपान हैं। जिस प्रकार कुम्हार मिट्टी को संस्कारित कर कलश का रूप देता है और शिल्पकार पत्थर को तराशकर प्रतिमा बना देता है, उसी प्रकार श्रेष्ठ संस्कार मनुष्य के जीवन और व्यक्तित्व को श्रेष्ठ बनाते हैं।
उन्होंने कहा कि केवल बाहरी रूप सुंदर होना पर्याप्त नहीं है। जीवन में ऐसे संस्कार होने चाहिए, जो व्यक्ति को संयम, नैतिकता और आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ाएं।
धन नहीं, धर्म श्रेष्ठ
पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने कहा कि धन से सुविधाएं प्राप्त की जा सकती हैं, लेकिन जीवन की वास्तविक सुख-शांति धर्म से ही संभव है। अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, क्षमा, संयम, त्याग, करुणा और दया धर्म के महत्वपूर्ण स्वरूप हैं।
उन्होंने कहा कि धर्म ही मंगल है, धर्म ही उत्तम है और धर्म ही मनुष्य जीवन का सार है। धन से जीवन धन्य नहीं होता, बल्कि धर्म से जीवन सार्थक और धन्य बनता है।
चित्र नहीं, चारित्र निहारो
आचार्यश्री ने प्रेरणा देते हुए कहा कि चित्र देखने की अपेक्षा चारित्र को देखना और उससे प्रेरणा लेना चाहिए। ऐसे चित्र देखने चाहिए, जो जीवन को पवित्र बनाने और श्रेष्ठ चारित्र धारण करने की प्रेरणा दें।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में यह विचार करना चाहिए कि वह जो देख रहा है, उसका प्रभाव उसके विचारों और आचरण पर कैसा पड़ रहा है।
क्षमता बढ़ाओ, सुख पाओ
पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने कहा कि साधक को अपनी साधना की क्षमता बढ़ानी चाहिए। समता ही साधुता है। जो व्यक्ति जितना अधिक सहन करना सीखता है, वह उतना ही श्रेष्ठता की ओर बढ़ता है।
उन्होंने मिट्टी का उदाहरण देते हुए कहा कि मिट्टी जब सहन करती है, तभी कलश का रूप प्राप्त करती है। इसी प्रकार सिद्धि की दिशा में आगे बढ़ने के लिए साधक को परिस्थितियों को समता और धैर्य के साथ सहन करना चाहिए।
हृदय-कमल खिलाओ, सिद्धि पाओ
आचार्यश्री ने कहा कि जिनका हृदय श्रद्धा और भक्ति से खिला रहता है तथा जिनके चारित्र में चमक होती है, उनके जीवन में आध्यात्मिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त होता है। साधक को प्रसन्नचित्त रहकर अपने चारित्र की निर्मलता और साधना की गुणवत्ता बढ़ानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि श्रद्धा और भक्ति से खिले हुए हृदय में गुरु और प्रभु के प्रति समर्पण का भाव स्वाभाविक रूप से विकसित होता है।
धर्मसभा का संदेश
धर्मसभा में दिए गए संदेश का सार यही रहा कि मनुष्य को बाहरी उपलब्धियों की अपेक्षा आत्मिक उन्नति पर ध्यान देना चाहिए। धन, ज्ञान और दिखावे से अधिक महत्वपूर्ण धर्म, संयम, संस्कार और चारित्र हैं।



