धामनोद। पर्वराज पर्युषण महापर्व के आठवें दिन उत्तम त्याग धर्म की श्रद्धापूर्वक आराधना की गई। बड़वानी में विराजित परम पूज्य चतुर्थ पट्टाचार्य आचार्य श्री 108 सुनीलसागरजी महाराज की शिष्या आर्यिका सुप्रज्ञमति माताजी ने त्याग धर्म का महत्व समझाते हुए कहा कि त्याग के अनेक रूप हैं।
आहारदान सबसे श्रेष्ठ दान
आर्यिका माताजी ने कहा कि क्रोध, मान, माया और लोभ का त्याग करना कठिन साधना है। संसार के आठ कर्मों से मुक्त होने के लिए सबसे पहले मिथ्यात्व का त्याग करना चाहिए। संयममय जीवन के लिए उत्कृष्ट चर्या का पालन और प्रमाद का त्याग आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि कमाए हुए धन को चार प्रकार के दान में लगाना चाहिए—
- आहार दान
- औषधि दान
- शास्त्र दान
- अभय दान
माताजी ने बताया कि आहार दान सबसे श्रेष्ठ दान है, क्योंकि इसमें चारों प्रकार के दान की भावना समाहित होती है। ज्ञान केवल पढ़ने से नहीं, साधना और मोह का त्याग करने से जीवन में प्रकट होता है।
मोह त्याग से समाप्त होता है प्रमाद
आर्यिका माताजी ने कहा कि शरीर के प्रति मोह कम किए बिना मोक्षमार्ग पर चलना संभव नहीं है। जैसे ही मोह का त्याग होता है, प्रमाद स्वतः कम होने लगता है। मोह रहते हुए त्याग के भाव नहीं आते और तप की साधना भी दृढ़ नहीं हो पाती।
उन्होंने संसार की अनिश्चितता का उदाहरण देते हुए कहा कि केवल धन का अर्जन जीवन का लक्ष्य नहीं है। व्यक्ति को अपने परिणामों की शुद्धि, संयम और धर्मसाधना पर ध्यान देना चाहिए।
आचार्य सन्मतिसागरजी का प्रेरक दृष्टांत
त्याग की प्रेरणा देते हुए आर्यिका माताजी ने तपस्वी सम्राट आचार्य श्री सन्मतिसागरजी महाराज के बनारस चातुर्मास का दृष्टांत सुनाया। उन्होंने बताया कि भीषण ठंड में कुछ मुनिराजों को नदी किनारे जाने में कठिनाई महसूस हुई। वहां सब्जी विक्रेताओं को जीवन-यापन के लिए ठंडे पानी में खड़े होकर परिश्रम करते देखकर आचार्यश्री ने साधुओं को प्रेरित किया कि मोक्षमार्ग के साधक को ठंड, गर्मी और वर्षा जैसी परिस्थितियों को सहन करते हुए संयम की साधना करनी चाहिए।
पूरे दिन चली धर्माराधना
प्रातः भगवान का अभिषेक, शांतिधारा, नित्य नियम पूजन, सोलहकारण पूजन, दशलक्षण पूजन, रत्नत्रय पूजन, तीर्थंकर भगवान पूजन एवं आरती हुई। दोपहर में तत्त्वार्थसूत्र का वाचन किया गया। सायंकाल प्रतिक्रमण, ध्यान, आरती, प्रवचन एवं धार्मिक प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं।




