देहरा तिजारा। 31वें चातुर्मास के पावन अवसर पर चंद्र तीर्थ मंडपम् में आयोजित धर्मसभा में परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी महाराज ने कहा कि भगवान जिनेंद्र देव की वाणी ही जिनवाणी है। जिनवाणी से अमृतरूपी रसायन की अविरल वर्षा होती रहती है। जो जीव श्रद्धा, भक्ति और सम्यक् भाव से इस अमृत का पान करता है, वही आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ता है।

आत्मा का वैभव शरीर से महान

मंदिर अध्यक्ष मुकेश जैन एवं प्रचार मंत्री उमंग जैन ने बताया कि आचार्य श्री ने प्रवचन में कहा कि तीर्थंकर भगवान का जीवन इस सत्य का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि आत्मा का वैभव शरीर से कहीं अधिक महान और शाश्वत है।

जब भव्य जीवों ने प्रभु से अजर-अमर होने का उपाय पूछा, तब भगवान ने स्पष्ट किया कि न अरिहंत, न सिद्ध, न आचार्य, न उपाध्याय और न ही साधु किसी जीव को अजर-अमर बना सकते हैं। प्रत्येक आत्मा को अपने पुरुषार्थ से ही मुक्ति का मार्ग तय करना होता है।

जिनवाणी से प्रकट होता है आत्मिक प्रकाश

आचार्य श्री ने कहा कि यदि जीवन को सार्थक बनाना है और आत्मा को जन्म-मरण के बंधन से मुक्त करना है तो जिनवाणी का अध्ययन, मनन और आचरण आवश्यक है।

जिनवाणी का अमृत जिस आत्मा के भीतर उतर जाता है, उसके जीवन में सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र का प्रकाश प्रकट होने लगता है। यही आत्मिक प्रकाश जीव को मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर करता है।

प्रतिदिन जिनवाणी के स्वाध्याय का संकल्प लें

प्रवचन के अंत में आचार्य श्री ने सभी श्रद्धालुओं से प्रतिदिन जिनवाणी के स्वाध्याय का संकल्प लेने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि जिनवाणी का अमृत आत्मा को शाश्वत सुख, आत्मशुद्धि और मोक्षमार्ग का दिव्य पथ प्रदान करता है।

धर्मसभा में श्रद्धालुओं की सहभागिता

धर्मसभा में मंदिर अध्यक्ष मुकेश जैन, महामंत्री नरेंद्र जैन, कोषाध्यक्ष शंभू जैन, प्रचार मंत्री उमंग जैन, चातुर्मास अध्यक्ष सुरेश जैन, अंशुल जैन, सुरेंद्र जैन (सुररू), रवि जैन, टीटू जैन, संयम जैन एवं शैलू जैन सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।