1. दृष्टि बदलने की प्रेरणदशलक्षण पर्व सिखाता है कि परिस्थितियों को बदलने से पहले अपनी सोच और दृष्टि को बदलना जरूरी है। सकारात्मक दृष्टिकोण जीवन में संतुलन और समाधान की राह दिखाता है।

उदाहरण: किसी व्यक्ति ने आपके साथ कठोर व्यवहार किया। तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय यदि आप सोचें कि सामने वाला भी किसी परेशानी में हो सकता है, तो विवाद बढ़ने से बच सकता है।

2. रिश्तों में बढ़ता विश्वास

क्षमा, मार्दव, सत्य और त्याग जैसे धर्म परिवार और समाज में विश्वास, अपनापन और सौहार्द को मजबूत करते हैं। ये भाव रिश्तों में आई दूरियों को कम करने की प्रेरणा देते हैं।

उदाहरण: परिवार में किसी सदस्य से गलती हो जाए और दूसरा व्यक्ति उसे अपमानित करने के बजाय क्षमा कर दे, तो रिश्ते में कड़वाहट के बजाय अपनापन बढ़ता है।

3. विकारों पर संयम

क्रोध, अहंकार, छल और लोभ जैसे विकारों को पहचानकर उन पर नियंत्रण करना दशलक्षण पर्व की महत्वपूर्ण सीख है। संयम, मर्यादा और विनय व्यक्ति के व्यवहार को संस्कारित बनाते हैं।

उदाहरण: व्यापार में अधिक लाभ का अवसर मिलने पर भी गलत तरीके का सहारा न लेना सत्य और संयम को व्यवहार में उतारना है।

4. व्यक्ति से परिवार और समाज तक प्रभाव

जब व्यक्ति के विचार और व्यवहार शुद्ध होते हैं, तो उसका प्रभाव परिवार पर पड़ता है और परिवार से समाज तक सकारात्मक वातावरण बनता है। एक व्यक्ति का परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत बन सकता है।

उदाहरण: घर का एक सदस्य क्रोध के समय शांत रहना सीखता है, तो धीरे-धीरे परिवार के अन्य सदस्य भी विवाद के बजाय संवाद को महत्व देने लगते हैं।

5. आत्मशुद्धि ही अंतिम लक्ष्य

दसों धर्म जीवन के अलग-अलग पक्षों को सुधारने की दिशा दिखाते हैं, लेकिन उनका अंतिम उद्देश्य आत्मशुद्धि है। भीतर का परिवर्तन ही धर्म को वास्तविक रूप से जीवन में उतारता है।

उदाहरण: केवल दशलक्षण पर्व में क्षमा मांगना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि वर्षभर किसी से विवाद होने पर मन में द्वेष न रखना ही उत्तम क्षमा को जीवन में उतारना है।

दशलक्षण पर्व में आने वाले व्रत और कल्याणक

तीर्थंकरों के कल्याणक

भाद्रपद शुक्ल छठ — भगवान सुपार्श्वनाथ का गर्भ कल्याणक

भाद्रपद शुक्ल अष्टमी — भगवान पुष्पदंत का मोक्ष कल्याणक

भाद्रपद शुक्ल चौदस — भगवान वासुपूज्य का मोक्ष कल्याणक

प्रमुख व्रत एवं धार्मिक अवसर

भाद्रपद शुक्ल पंचमी — दशलक्षण व्रत

भाद्रपद शुक्ल पंचमी — पुष्पांजलि व्रत

भाद्रपद शुक्ल सप्तमी — मुक्तावली व्रत एवं शील सप्तमी

भाद्रपद शुक्ल अष्टमी — निशल्य अष्टमी

भाद्रपद शुक्ल दशमी — सुगंध दशमी

भाद्रपद शुक्ल ग्यारस — अनंत व्रत प्रारंभ

भाद्रपद शुक्ल तेरस — रत्नत्रय व्रत प्रारंभ

भाद्रपद शुक्ल चौदस — अनंत चतुर्दशी

भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा — रत्नत्रय व्रत पूर्ण

2026 में दशलक्षण पर्व

16 सितंबर — उत्तम क्षमा धर्म

17 सितंबर — उत्तम मार्दव धर्म

18 सितंबर — उत्तम आर्जव धर्म

19 सितंबर — उत्तम शौच धर्म

20 सितंबर — उत्तम सत्य धर्म

21 सितंबर — उत्तम संयम धर्म

22 सितंबर — उत्तम तप धर्म

23 सितंबर — उत्तम त्याग धर्म

24 सितंबर — उत्तम आकिंचन्य धर्म

25 सितंबर — उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म

27 सितंबर — क्षमावाणी पर्व

दशलक्षण पर्व में तत्त्वार्थ सूत्र का पाठ

दशलक्षण पर्व के दस दिनों में तत्त्वार्थ सूत्र के पाठ की विशेष परंपरा है। तत्त्वार्थ सूत्र में 10 अध्याय और 357 सूत्र हैं। प्रत्येक दिन एक-एक अध्याय का वाचन किया जाता है और प्रतिदिन सभी 10 अध्यायों का पाठ भी किया जाता है।

तत्त्वार्थ सूत्र के पाठ से पहले सरस्वती पूजन तथा कई स्थानों पर तत्त्वार्थ सूत्र की विधिवत पूजा भी की जाती है। इसके बाद श्रद्धापूर्वक सूत्रों का वाचन एवं पाठ किया जाता है।

यह परंपरा जैन समाज में कई वर्षों से चली आ रही है। तत्त्वार्थ सूत्र के अध्ययन और पाठ के माध्य

म से दशलक्षण पर्व के दौरान तत्त्वज्ञान, धर्म और आत्मचिंतन की भावना को और गहराई मिलती है।