सुबह छह बजे से रात साढ़े दस बजे तक धर्ममय दिनचर्या, विदेश में रहने वाले बच्चे भी निभा रहे रात्रि भोजन और कंदमूल त्याग का नियम
श्रीफल की विशेष श्रृंखला ‘दस दिन–दस परिवार’ में आज जानिए उदय नगर जैन समाज के कार्याध्यक्ष संदीप जैन और उनके परिवार की दशलक्षण दिनचर्या।
दशलक्षण महापर्व आते ही संदीप जैन परिवार की पूरी दिनचर्या बदल जाती है। सुबह मंदिर की आराधना, दिन में शिविरार्थियों की सेवा, एक समय फलाहार और शाम को फिर सामायिक व आरती—इन दस दिनों में परिवार का अधिकांश समय धर्म-साधना में बीतता है। परिवार ने पूरे पर्व के लिए अन्न का पूर्ण त्याग किया है और सभी सदस्य दिन में केवल एक बार फलाहार ग्रहण करते हैं।
श्रीफल समूह की समूह संपादक रेखा जैन से विशेष बातचीत में संदीप जैन ने बताया कि दशलक्षण के दिनों में उनकी सुबह लगभग पांच बजे शुरू हो जाती है। परिवार के सदस्य तैयार होकर छह बजे तक मंदिर पहुंच जाते हैं। वहां अभिषेक, शांतिधारा, नित्य नियम पूजन और दशलक्षण विधान की आराधना करते हैं। इसके बाद माताजी के प्रवचन सुनते हैं। सुबह का यह क्रम करीब दस या साढ़े दस बजे तक चलता है।
शिविरार्थियों की सेवा के बाद करता है परिवार फलाहार
मंदिर से लौटते समय संदीप जैन परिवार प्रतिदिन पांच से सात शिविरार्थियों को अपने घर लाता है और उन्हें शुद्ध भोजन कराता है। शिविरार्थियों की भोजन व्यवस्था पूरी होने के बाद ही परिवार के सदस्य अपना फलाहार ग्रहण करते हैं।
संदीप जैन ने बताया कि परिवार ने दस दिनों तक अन्न नहीं लेने का नियम रखा है। सभी सदस्य एक बार बैठकर फलाहार और पानी ग्रहण करते हैं। उनका मानना है कि दशलक्षण में अपने नियमों के साथ अतिथि और शिविरार्थियों की सेवा करना भी धर्म आराधना का हिस्सा है।
शाम को फिर मंदिर पहुंचता है पूरा परिवार
दिन में फलाहार और कुछ समय विश्राम के बाद परिवार शाम करीब पांच या साढ़े पांच बजे फिर मंदिर पहुंच जाता है। वहां सामायिक, आरती और प्रवचन में शामिल होता है। इसके बाद धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी सहभागिता रहती है।
यह क्रम रात करीब दस या साढ़े दस बजे तक चलता है। घर लौटते-लौटते लगभग ग्यारह बज जाते हैं। इस तरह सुबह पांच बजे शुरू हुई परिवार की दिनचर्या देर रात तक धर्म और सेवा से जुड़ी रहती है।
विदेश में रहकर भी नियम निभा रहे बच्चे
रेखा जैन से बातचीत में संदीप जैन ने बताया कि उनके बच्चे विदेश में रहते हैं। मंदिर दूर होने और दैनिक कामकाज के कारण वे रोज मंदिर नहीं जा पाते, लेकिन अपनी परिस्थिति के अनुसार दशलक्षण पर्व के नियमों का पालन कर रहे हैं।
बच्चे रात्रि में भोजन नहीं करते और आलू-प्याज सहित कंदमूल पदार्थों का त्याग रखते हैं। अवसर मिलने पर मंदिर जाकर दर्शन और आराधना भी करते हैं। परिवार का मानना है कि स्थान बदलने से धर्म के संस्कार नहीं बदलते। जहां जितना संभव हो, उतना नियम श्रद्धा के साथ निभाया जा सकता है।
अलग-अलग स्थानों पर रहकर भी संस्कार एक
संदीप जैन परिवार के सदस्य भले ही अलग-अलग स्थानों पर रहते हों, लेकिन दशलक्षण पर्व सभी को एक ही धार्मिक भावना से जोड़े रखता है। उदय नगर में रहने वाले सदस्य मंदिर की आराधना, फलाहार और शिविरार्थियों की सेवा में जुड़े हैं, जबकि विदेश में रहने वाले बच्चे रात्रि भोजन और कंदमूल त्याग का नियम निभा रहे हैं।
रेखा जैन और संदीप जैन की बातचीत से यह सामने आया कि इस परिवार के लिए दशलक्षण पर्व केवल पूजा-पाठ का अवसर नहीं है। इन दस दिनों में परिवार अपने भोजन, समय और सुविधाओं पर संयम रखता है, शिविरार्थियों की सेवा करता है और बच्चों को भी परिस्थिति के अनुसार छोटे-छोटे नियमों से धर्म से जोड़े रखता है।
संदीप जैन परिवार की दिनचर्या बताती है कि दशलक्षण पर्व का प्रभाव तभी दिखाई देता है, जब मंदिर की आराधना के साथ घर का व्यवहार, भोजन और पारिवारिक जीवन भी संयम और सेवा से जुड़ जाए।





