मुरैना। श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर, मुरैना में धर्मसभा में आचार्य श्री उदारसागरजी महाराज ने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन की प्रत्येक क्रिया के प्रति सजग और सावधान रहना चाहिए। हम कैसे चलते हैं, कैसे बैठते हैं, क्या बोलते हैं, किस प्रकार भोजन करते हैं और कैसे सोते हैं, इन सभी बातों में विवेक रखना आवश्यक है। हमारी किसी भी गतिविधि से किसी जीव को कष्ट न पहुंचे और अनावश्यक हिंसा से बचा जा सके, यही अहिंसामय जीवन की सच्ची पहचान है। आचार्यश्री ने कहा कि सावधानी केवल मुनियों के जीवन का अंग नहीं है, बल्कि प्रत्येक श्रावक के लिए भी उतनी ही आवश्यक है। चलते समय ध्यान रखने से दुर्घटनाओं से बचाव होता है और मार्ग में पड़ी वस्तुओं के साथ छोटे-छोटे जीवों को भी देखा जा सकता है। जीवन में जल्दबाजी के बजाय जागरूकता और विवेक अपनाना चाहिए, क्योंकि क्षणभर की असावधानी भी कई बार नुकसान का कारण बन जाती है।
व्यवहार में शालीनता और वाणी में मधुरता जरूरी
आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य का व्यवहार ऐसा होना चाहिए, जिससे किसी को असुविधा या मानसिक पीड़ा न हो। उन्होंने कहा, “बैठक ऐसी बैठिए, कोई न कहवे उठ। वाणी ऐसी बोलिए, कोई न कहवे चुप।” इसका आशय है कि हमारा बैठना दूसरों के लिए परेशानी का कारण न बने और हमारी वाणी किसी के हृदय को ठेस न पहुंचाए। कटु शब्द भी मन को आहत करते हैं, इसलिए मधुर, मर्यादित और संयमित वाणी का प्रयोग करना चाहिए। अहिंसा केवल शारीरिक क्रियाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि विचारों और शब्दों में भी उसका पालन होना चाहिए। शयन में सावधानी का महत्व बताते हुए उन्होंने कहा कि सोने से पहले बिस्तर को अच्छी तरह देखकर और फटकारकर सोना चाहिए। इससे छोटे जीवों को अनजाने में होने वाली हानि से बचाया जा सकता है और स्वयं भी संभावित खतरे से सुरक्षित रह सकते हैं। धर्म का पालन करने के लिए जीवन की छोटी-छोटी आदतों में भी जागरूकता आवश्यक है।
भोजन में स्वाद के साथ स्वास्थ्य का भी रखें ध्यान
आचार्यश्री ने भोजन के विषय में कहा कि मनुष्य को विवेकपूर्वक आहार ग्रहण करना चाहिए। क्या खाना उचित है, क्या शरीर के लिए हितकारी है और किन पदार्थों से बचना चाहिए, इसका विचार आवश्यक है। केवल स्वाद के वशीभूत होकर भोजन करना उचित नहीं है। भोजन में संयम रखने से स्वास्थ्य की रक्षा होती है और जीवन में अनुशासन भी बना रहता है। उन्होंने स्वास्थ्य के संदर्भ में प्रचलित उक्ति आधा भोजन खाइए, पानी दुगुना पीजिए और थोड़ा श्रम भी कीजिए” का उल्लेख करते हुए संतुलित आहार, आवश्यकतानुसार जल सेवन और नियमित शारीरिक श्रम के महत्व को समझाया। आचार्यश्री ने कहा कि धर्म का वास्तविक स्वरूप हमारे आचरण में दिखाई देना चाहिए। चलने में सावधानी, बैठने में शालीनता, वाणी में मधुरता, भोजन में संयम और प्रत्येक जीव के प्रति करुणा का भाव ही धर्म को जीवन का हिस्सा बनाते हैं। पूजा-पाठ के साथ यदि व्यवहार में अहिंसा नहीं है, तो धार्मिक जीवन की पूर्णता संभव नहीं है।
अहिंसा का पालन केवल विचारों में नहीं, आचरण में भी होना चाहिए : मुनिश्री उपशांतसागर जी
मुनि श्री उपशांतसागरजी महाराज ने धर्मसभा में कहा कि धर्म का वास्तविक प्रभाव मनुष्य के व्यवहार और उसकी दिनचर्या में दिखाई देना चाहिए। अहिंसा का अर्थ केवल किसी जीव को जानबूझकर कष्ट नहीं पहुंचाना नहीं है, बल्कि अपनी प्रत्येक गतिविधि में इतना सजग रहना भी है कि अनजाने में भी किसी जीव को नुकसान न पहुंचे। मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य अक्सर बड़े धार्मिक अनुष्ठानों को महत्व देता है, लेकिन जीवन की छोटी-छोटी क्रियाओं में सावधानी रखना भूल जाता है। चलते समय ध्यान रखना, भोजन को देखकर ग्रहण करना, सोने से पहले बिस्तर की जांच करना और बोलते समय शब्दों का चयन करना भी धर्माचरण के महत्वपूर्ण अंग हैं। दूसरों के प्रति संवेदनशीलता और अपने व्यवहार पर नियंत्रण ही अहिंसा को सार्थक बनाते हैं। उन्होंने कहा कि मधुर वाणी मनुष्यों के बीच प्रेम और सद्भाव बढ़ाती है, जबकि कटु वचन संबंधों में दूरी पैदा करते हैं। इसलिए बोलने से पहले विचार करना चाहिए कि हमारे शब्दों से किसी को दुख तो नहीं पहुंचेगा। इसी प्रकार भोजन में संयम और दिनचर्या में अनुशासन अपनाने से जीवन स्वस्थ एवं व्यवस्थित बनता है।




