मुरैना। श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आयोजित धर्मसभा में चातुर्मासरत आचार्य श्री 108 उदारसागरजी महाराज ने जिनेंद्र भगवान के दर्शन के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भगवान के दर्शन मात्र से मनुष्य के जीवन में शुभ भावों का जागरण होता है और वह आत्मकल्याण के मार्ग की ओर अग्रसर होता है। भगवान के दर्शन केवल बाहरी क्रिया नहीं हैं बल्कि उनके वीतराग स्वरूप को देखकर अपने जीवन में भी राग-द्वेष को कम करने की प्रेरणा लेना ही सच्चे दर्शन हैं। आचार्यश्री ने दर्शन के महत्व को समझाने के लिए एक सेठ का प्रेरक प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि एक नगर में दिगंबर मुनिराज का आगमन हुआ। नगर के सभी लोग मुनिराज के दर्शन एवं प्रवचन का लाभ लेने पहुंचे। प्रवचन के बाद अनेक लोगों ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार मुनिराज से नियम ग्रहण किए। जब सेठ की बारी आई तो उसने कोई नियम लेने से इनकार कर दिया। अंत में सेठ ने कहा कि उसके घर के सामने एक कुम्हार रहता है और उसके पास एक गधा है। वह प्रतिदिन सबसे पहले उठकर उस गधे के दर्शन करने का नियम लेगा। मुनिराज ने सेठ के इस नियम को भी स्वीकार कर लिया।

गधे के दर्शन के नियम से मुझे संसार का खजाना प्राप्त हुआ

एक दिन कुम्हार सुबह-सुबह अपने गधे को लेकर जंगल चला गया। सेठ जब उठा तो उसे गधा दिखाई नहीं दिया। जानकारी मिलने पर पता चला कि गधा जंगल गया है। सेठ भी गधे के दर्शन करने जंगल पहुंच गया। वहां उसने कुम्हार को मिट्टी खोदते हुए देखा। उसी दौरान कुम्हार को जमीन में दबा हुआ खजाना मिल गया। कुम्हार ने सोचा कि सेठ ने खजाना देख लिया है इसलिए उसने सेठ से कहा कि इस खजाने को दोनों आधा-आधा बांट लेंगे। यह देखकर सेठ बहुत प्रसन्न हुआ। उसके मन में विचार आया कि यदि गधे के दर्शन के नियम से मुझे संसार का खजाना प्राप्त हो सकता है तो जिनेंद्र भगवान के दर्शन करने से जीवन में इससे भी बड़ा आत्मिक खजाना प्राप्त हो सकता है।

भीतर के राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया को कम करें

आचार्यश्री ने कहा कि यह प्रसंग हमें भगवान के दर्शन के प्रति श्रद्धा, नियमितता और भावना रखने की प्रेरणा देता है। संसार का धन-संपत्ति रूपी खजाना क्षणिक सुख दे सकता है, लेकिन जिनेंद्र भगवान की आराधना और उनके बताए वीतराग मार्ग पर चलने से आत्मा के कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है। प्रसंग से प्रेरित होकर सेठ ने अंततः मुनिराज से नियम ग्रहण किया। उन्होंने कहा कि मंदिर जाना और भगवान के दर्शन करना तभी सार्थक है। जब उनके वीतराग स्वरूप से प्रेरणा लेकर हम अपने भीतर के राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया और लोभ को कम करने का पुरुषार्थ करें। यही भगवान के दर्शन की वास्तविक फलश्रुति है।

भजन और भोजन दोनों जीवन के आधार:-मुनिश्री उपशांतसागर जी

नगर में चातुर्मासरत मुनिश्री उपशांतसागर महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा में “भजन और भोजन” विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मनुष्य के जीवन में भोजन शरीर को ऊर्जा देता है, जबकि भजन आत्मा को शांति और धर्म की दिशा प्रदान करता है। भोजन शरीर की आवश्यकता है, लेकिन भजन आत्मा की आवश्यकता है। भोजन कैसा हो, कितना हो और किस भावना से ग्रहण किया जाए, इसका प्रभाव हमारे शरीर और मन दोनों पर पड़ता है। इसी प्रकार हमारा भजन भी केवल शब्दों और गायन तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसमें भगवान के गुणों का स्मरण और आत्मकल्याण की भावना होनी चाहिए।

भजन जीवन को सार्थक बनाता है

उन्होंने कहा कि जैन दर्शन हमें संयमित आहार और शुद्ध विचार का संदेश देता है। जिस प्रकार अशुद्ध भोजन शरीर को नुकसान पहुंचाता है, उसी प्रकार अशुद्ध विचार और विषय-कषाय आत्मिक जीवन को दूषित करते हैं। इसलिए भोजन में संयम और जीवन में भजन के साथ सम्यग्दर्शन, आत्मचिंतन और अहिंसा को स्थान देना चाहिए। मुनिश्री ने कहा कि भोजन पेट भरता है, लेकिन भजन जीवन को सार्थक बनाता है। मनुष्य को स्वाद के पीछे नहीं, आत्मकल्याण के मार्ग पर चलने का प्रयास करना चाहिए। यही जैन धर्म की सच्ची साधना है।

विधान महामस्तकाभिषेक के साथ छत्रों की पुनः स्थापना

श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में रिद्धि सिद्धि योग के शुभ अवसर पर श्री मुनिसुब्रतनाथ भगवान जी का महामस्तकाभिषेक, वेदी शुद्धि, चोरी हुए छत्र की पुनः स्थापना की गई। ज्ञात हो कि कुछ दिन पूर्व भगवान मुनिसुव्रत नाथ के सिर के ऊपर लगे चांदी के छत्र चोरी हो गए थे, जो कि पुलिस ने बरामद कर लिए थे। आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज एवं मुनिश्री उपशांत सागरजी महाराज के सान्निध्य एवं निर्देशन में प्रतिष्ठाचार्य पंडित महेंद्रकुमार शास्त्री, सह प्रतिष्ठाचार्य नवनीत शास्त्री एवं मनोज शास्त्री ने उन छत्रों को विधिविधान पूर्वक मंत्रोच्चारण के साथ पुनः जिनेंद्र प्रभु के सिर पर मोहित पारस जैन (तार वाले) के कर कमलों से स्थापित कराया। भगवान मुनिसुव्रत नाथ महामस्तकाभिषेक में प्रथम कलश करने का सौभाग्य मूलचंद, मनीष, आकाश, पियूष जैन पोरसा परिवार को एवं शांतिधारा करने का सौभाग्य कमेटी के कोषाध्यक्ष वीरेंद्रकुमार आकाश कुमार जैन जतवार के पूरे परिवार को प्राप्त हुआ।