आगरा। निर्मल सेवा सदन, रकाबगंज-छीपीटोला में पर्युषण महापर्व के चौथे दिन उत्तम शौच धर्म की आराधना के साथ आत्मस्पंदन ध्यान शिविर श्रद्धा और भक्तिभाव से आयोजित हुआ। संतचर्या शिरोमणि आचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी महाराज के प्रभावक शिष्य मुनि श्री 108 समत्वसागर जी, मुनि श्री 108 शीलसागर जी एवं मुनि श्री 108 सुप्रभातसागर जी के सान्निध्य तथा पं. प्रदीप शास्त्री दमोह के निर्देशन में शिविरार्थियों ने धर्म आराधना की।
अभिषेक-शांतिधारा से संगीतमय विधान तक हुई आराधना
शिविर में श्रद्धालुओं ने पूजन, अभिषेक एवं शांतिधारा में भक्तिभाव से भाग लिया। इसके बाद दीप प्रज्ज्वलन, पाद प्रक्षालन, शास्त्र भेंट और मंगलाचरण हुआ। संगीतमय विधान के दौरान भजनों पर श्रद्धालुओं ने भक्तिमय प्रस्तुतियां दीं।
दिनभर भक्ति, साधना, अनुशासन और आत्मचिंतन का वातावरण रहा।
‘जमीन पर दौड़ते रहने से नहीं मिलती ऊंचाई’
धर्मसभा में मुनि श्री समत्वसागर जी महाराज ने उत्तम शौच धर्म को आत्मशुद्धि से जोड़ते हुए कहा कि हर व्यक्ति जीवन में आनंद और ऊंचाई प्राप्त करना चाहता है, लेकिन केवल तेज गति से दौड़ना ऊंचाई प्राप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार जमीन पर तेज दौड़ने वाला वाहन अपनी गति से आकाश में नहीं उड़ सकता, उसी तरह जीवन में केवल बाहरी उपलब्धियां व्यक्ति को आत्मिक ऊंचाई तक नहीं पहुंचा सकतीं। उसके लिए भीतर की शुद्धता आवश्यक है।
ईंधन के उदाहरण से समझाई जीवन की शुद्धता
मुनि श्री ने वाहन और हवाई जहाज के ईंधन का उदाहरण देते हुए कहा कि ईंधन की गुणवत्ता यात्रा की गति और ऊंचाई को प्रभावित करती है। अशुद्ध ईंधन होने पर वाहन में रुकावट और अनावश्यक आवाज आने लगती है, जबकि उपयुक्त और शुद्ध ईंधन यात्रा को सहज बनाता है।
इसी तरह जीवन में क्रोध, मान, माया, लोभ और परिग्रह जैसी अशुद्धियां बढ़ती हैं तो व्यक्ति की आंतरिक यात्रा में बाधाएं आने लगती हैं।
उन्होंने कहा कि यदि जीवन में ऊंचाइयां प्राप्त करनी हैं तो सबसे पहले अपने ‘अंतरंग के ईंधन’ को शुद्ध करने की आवश्यकता है।
‘ऊंचाई पर जाना है तो भार छोड़ना पड़ेगा’
मुनि समत्वसागर जी ने सम्मेदशिखर की वंदना का उदाहरण देते हुए कहा कि पहाड़ पर चढ़ते समय भारी सामान यात्रा को कठिन बना देता है। जितना भार कम होता जाता है, चढ़ाई उतनी ही सहज होती है।
उन्होंने कहा, “ऊंचाई पर जाना है तो छोड़ना पड़ता है, हल्का होना है तो भार उतारना पड़ता है।”
मुनि श्री ने इसे आध्यात्मिक जीवन से जोड़ते हुए कहा कि परिग्रह और भीतर के विकारों का भार कम किए बिना आत्मिक ऊंचाइयों की यात्रा कठिन होती है।
सब कुछ होते हुए भी मन अशांत क्यों?
मुनि श्री ने कहा कि भौतिक सुविधाएं होने के बावजूद कई बार व्यक्ति का मन अशांत रहता है। बाहरी साधनों की उपलब्धता अपने आप आंतरिक आनंद की गारंटी नहीं बनती।
उन्होंने श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन की प्रेरणा देते हुए कहा कि जब मन अशांत हो तो केवल बाहर कारण खोजने के बजाय यह भी देखना चाहिए कि भीतर कौन-सी अशुद्धियां और अनावश्यक भार मन की शांति को प्रभावित कर रहे हैं।
उत्तम शौच की साधना—भीतर की अशुद्धियों को पहचानना
प्रवचन का सार बताते हुए मुनि श्री ने कहा कि उत्तम शौच धर्म व्यक्ति को केवल बाहरी स्वच्छता तक सीमित नहीं रखता, बल्कि अपने भीतर के विकारों को पहचानकर उन्हें कम करने की दिशा देता है।
जीवन में जितनी आंतरिक शुद्धता बढ़ती है, व्यक्ति उतना ही शांति, सहजता और आत्मिक उन्नति की दिशा में आगे बढ़ता है।
20 सितंबर को उत्तम सत्य धर्म की आराधना
मंच संचालन सतेंद्र जैन साहूला ने किया। आयोजन में श्रुत मंथन वर्षायोग समिति के रमेश जैन, मनोज जैन, मुकेश जैन, प्रवीण जैन पद्मावती, शैलेश जैन, मुकेश जैन लले, विवेक जैन, चक्रेश जैन, राजीव जैन, आशीष जैन बाबा, सतेंद्र जैन साहूला, दीपक जैन, रोहित जैन सहित सकल जैन समाज के श्रद्धालु उपस्थित रहे।
मीडिया प्रभारी राहुल जैन ने बताया कि 20 सितंबर को सुबह 7 बजे निर्मल सेवा सदन, छीपीटोला में दशलक्षण महापर्व के पांचवें दिन उत्तम सत्य धर्म के अवसर पर अभिषेक, पूजन एवं विधान होगा। उन्होंने बताया कि इसी दिन राष्ट्रसंत आचार्य लोकेश मुनि जी का आगरा आगमन भी प्रस्तावित है।




