सीकर। पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी 36 साधु सहित यहां 58 वें वर्षायोग के लिए चातुर्मास करने को विराजित हैं। आचार्य वर्धमान सागर धर्म वात्सल्य वर्षायोग चातुर्मास समिति, श्री दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर बीस पंथ आम्नाय प्रबंध समिति द्वारा सकल दिगंबर जैन समाज के सहयोग से आचार्य श्री वर्धमान सागर जी एवं साधुओं के सानिध्य में रत्नकरण्ड श्रावकाचार शिक्षण शिविर का आयोजन 9 अगस्त से 9 सितंबर तक आयोजित किया जा रहा है। जिसमें वयस्क वर्ग के लिए रत्नकरण्ड श्रावकाचार की कक्षा प्रातः एवं दोपहर को रखी गई है। इसी प्रकार बालकों के लिए बाल बोध प्रथम, द्वितीय और तृतीय भाग की कक्षा शाम को 6 से 7 बजे तक ली जाएंगी।

बच्चे अष्ट मूल गुणों का करें पूरा पालन

डॉ. राजेश पंचोलिया ने बताया कि चातुर्मास कमेटी एवं प्रबंध समिति को धार्मिक शिविर के लिए आशीर्वाद देते हुए आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने कहा कि धार्मिक शिविर से बच्चे शिक्षा और संस्कार ग्रहण कर आगे चलकर भाग्य का निर्माण करते हैं। बच्चों को अच्छी शिक्षा ग्रहण करना चाहिए। शिक्षा और संस्कार से सभी क्षेत्र चाहे व्यापार हो, नौकरी हो इसमें वे उन्नति करते हैं। बच्चों को लौकिक शिक्षा के साथ कुल मर्यादा को नहीं भूलना चाहिए। उन्हें देव दर्शन, पानी छानकर पीने, रात्रि भोजन नहीं करने, सप्त व्यसनों से दूर रहने के लिए प्रेरित किया जाए तथा वे अष्ट मूल गुणों का पालन करना चाहिए।

भाव परिणामों के अनुसार उदित होते हैं सबके कर्म

आचार्य श्री ने कहा कि इन धार्मिक संस्कारों से जीवन में उन्नति होती है तथा सामाजिक क्षेत्र में प्रतिष्ठा मिलती है। जिन धर्म और जिन शासन की प्रभावना होती है। मुनि श्री मुमुक्षु सागर जी ने प्रवचन में कर्म सिद्धांत की विवेचना की। उन्होंने कहा कि कि संसार में जैसे आप कार्य करते हैं, उसके अनुसार कष्ट ,सुख और दुख पुण्य और पाप मिलता है। संसार में अकेले आए हो, अकेले जाना है। कोई अपना सगा नहीं है। कर्म सबके साथ एक जैसा न्यायाधीश बनकर व्यवहार करते हैं। अमीर-गरीब का भेदभाव नहीं है। जैसे कर्म आप उपार्जित करते हैं, उसे अनुसार फल मिलता है। इसलिए तत्वों और आत्मा के स्वरूप को समझें। आपके भाव परिणाम कैसा है। उस कारण कर्म उदय में आते हैं।