इस अवसर्पिणी युग का प्रारंभ ही स्त्री शक्ति के विकास एवं महत्व की सर्वाधिक महत्वपूर्ण आधारशिला है। प्रभु श्री आदिनाथ ने अपने ग्रहस्थावस्था में भी भोगभूमि से कर्मभूमि में परिणत भरत क्षेत्र की आकुलित जनता को षटकर्म का उपदेश दे कर जीवन निर्वाह की कला से परिचित कराया। असि, मसि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प। प्रभु ने स्त्री जाति के महत्व को इस युग में रेखांकित करते हुए मसि यानि लेखन विधा और विद्या, इन दो कलाओं का शिक्षण अपनी पुत्रियों ब्राम्ही और सुंदरी को ही दिया। पढ़िए महिला दिवस पर विशेष आलेख…
आचार्य भगवंत ने मां की ममता शब्द का प्रयोग करके मातृत्व गुण का महत्व बहुत ही सुंदर रूप में प्रस्तुत किया है। व्यवहार में भी ईश्वर को परमात्मा कहा जाता है, जिसका अंतिम वर्ण है मां। आकाश को आसमां कहा जाता है, जिसका अंतिम वर्ण है मां। संत को महात्मा कहा जाता है, जिसका अंतिम वर्ण है मां। विश्व की समस्त विशालताओं में विशालतम है-परमात्मा, आसमां और महात्मा। किंतु ये शब्द संग्रह भी मां वर्ण के बिना अधूरे हैं, अपूर्ण हैं।
प्रवचनसार ग्रंथ में श्रमणों के श्रद्धा पुरुष, अध्यात्म सरोवर के राजहंस आचार्य भगवंत श्री कुंदकुंद स्वामी ने अपनी पावन पीयूष देशना में उद्धृत किया है कि केवली प्रभु का रुकना, चलना, बैठना और दिव्य ध्वनि का खिरना स्वयं की इच्छा से नहीं होता, किंतु सहज ही होता है। उसकी सहजता, स्वभावता को स्पष्ट करते हुए आचार्य भगवंत अंतिम चरण में उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं कि जैसे स्त्रियों में मताचार स्वभाव से पाया जाता है, वैसे ही प्रभु पुरुषार्थ प्रयास नहीं करते।
इस अवसर्पिणी युग का प्रारंभ ही स्त्री शक्ति के विकास एवं महत्व की सर्वाधिक महत्वपूर्ण आधारशिला है। प्रभु श्री आदिनाथ ने अपने ग्रहस्थावस्था में भी भोगभूमि से कर्मभूमि में परिणत भरत क्षेत्र की आकुलित जनता को षटकर्म का उपदेश दे कर जीवन निर्वाह की कला से परिचित कराया। असि, मसि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प। प्रभु ने स्त्री जाति के महत्व को इस युग में रेखांकित करते हुए मसि यानि लेखन विधा और विद्या, इन दो कलाओं का शिक्षण अपनी पुत्रियों ब्राम्ही और सुंदरी को ही दिया। स्त्री शिक्षा, स्त्री सशक्तीकरण का इससे ज्यादा सशक्त उदाहरण और दूसरा नहीं हो सकता।
जैनागम के अनुसार तीर्थंकर की पुत्रियां नहीं होतीं, परंतु युग के आदि में ही वृषभनाथ प्रभु की पुत्रियों ब्राम्ही और सुंदरी के जन्म से हम यही तात्पर्य निकाल सकते हैं कि पंचम युग में स्त्रियों के महत्व के रेखांकन के लिए ही उनका जन्म हुआ। उन्हें शिक्षा-विधा से समृद्ध करना स्त्री सशक्तीकरण का एक महत्वपूर्ण कदम रहा है। प्रभु वृषभनाथ से वर्धमान तक इसी तरह सभी तीर्थंकरों के शासनकाल में उनकी रानियों को सम्माननीय स्थान दिया गया। प्रभु राम ने तो मात्र अपनी सौतेली मां को आघात ना पहुंचे, इसलिए स्वयं ही वन गमन के कठिन निर्णय का वरण कर लिया था।
आदिपुराण एवं प्रतिष्ठा ग्रंथों के अनुसार प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा के अवसर पर लगभग सभी मांगलिक क्रियाओं का प्रारंभ सौभाग्यवती महिलाओं के पवित्र हाथों से ही संपन्न होता है।
जैन शासन अथवा यूं कहें कि मानव जीवन के अंकुरण, उसके विकास आदि सभी महत्वपूर्ण स्थानों पर महिला अथवा स्त्री की भूमिका को किसी भी परिप्रेक्ष्य में कम नहीं आंका गया है।
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