अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्य सागरजी महाराज के सानिध्य में प्रतिदिन आदिनाथ पुराण का वाचन हो रहा है। मुनिश्री पूज्य सागरजी महाराज ने आहारदान के विषय पर अपना ध्यान आकर्षित करते हुवे कहा कि जैन धर्म में दान का बहुत महत्व है और दान में सबसे ज्यादा महत्व आहारदान का है। पढ़िए सनावद की यह पूरी खबर…
सनावद। नगर में 15 दिनों से धर्म की गंगा प्रवाह कर रहे मुनिश्री पूज्य सागरजी महाराज बड़े मंदिरजी में प्रतिदिन अपनी वाणी का रसपान करवा रहे है। आज प्रातः की बेला में सभा की शुरुआत भगवान महावीर स्वामी के चित्र के समकक्ष ऊषा लाठिया, अविनाश जैन, निधि जैन के द्वारा दीप प्रज्वलित कर की गई।
आहारदान के महत्व पर प्रकाश डाला
मुनिश्री पूज्य सागरजी महाराज ने छह ढाला के छठे सूत्र का वर्णन करते हुवे उसकी धर्म प्रभावना को समझाया। कहा जैन धर्म में दान का बहुत महत्व है और दान में सबसे ज्यादा महत्व आहारदान का है जो श्रावक अपने घर पर परिवार सहित साधु-संतों को आहारदान देता है। उसका मानव जीवन सफल हो जाता है। आहारदान देने वाला व्यक्ति कभी दुखी और भूखा नहीं रह सकता है। इसलिए आप सभी अपनी सामर्थ्य के अनुसार साधु-संतों को आहारदान अवश्य करें। श्रावक के लिए आहारदान सबसे श्रेष्ठ दान है। आहारदान में अद्भुत आनंद की प्राप्ति होती है, मन एकाग्र होता है, जबसे चौका लगाने का भाव करते हैं तब से पुण्य बंध प्रारंभ हो जाता है।
आहार देने तक धर्म ध्यान होता रहता है
चौके में सुबह से लेकर जब तक आहार देते हैं तब तक 5-6 घंटे तक धर्म ध्यान होता रहता है। अन्य धार्मिक क्रियाएं इतने समय तक नहीं कर पाते हैं। पूजन, अभिषेक, विधान आदि एक-दो घंटे स्वाध्याय भी एक-दो घंटे ही लगातार कर सकते हैं। अतः आहारदान में सबसे अधिक धर्म ध्यान होता है। भावों में विशुद्धि रहती है। कहीं चौके में लापरवाही ना हो जाए, जिससे साधुओं का अंतराय हो सकता है। अतः सावधानीपूर्वक हर कार्य किया जाता है। आज मुनिश्री को आहारदान देने का सौभाग्य कुसुम कुमार पंचोलिया काका परिवार को प्राप्त हुआ। इस अवसर पर सभी समाजजन उपस्थित थे।
Add Comment