दोहों का रहस्य समाचार

दोहों का रहस्य -73 दया केवल भावुकता नहीं, बल्कि अहंकार का विसर्जन है : भक्ति का अर्थ परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण है


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 73वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


दया का लच्छन भक्ति है, भक्ति से होवे ध्यान।

ध्यान से मिलता है ज्ञान, यह सिद्धांत उरान।।


कबीरदास जी का यह प्रसिद्ध पद हमें जीवन में सच्ची उन्नति के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शन देता है।

कबीरदास जी के अनुसार, दया किसी भी आध्यात्मिक साधना का मूल है। दया केवल भावुकता नहीं, बल्कि यह अहंकार का विसर्जन है। जब व्यक्ति अपने हृदय में दया का संचार करता है, तो वह दूसरों के सुख-दुःख को महसूस करने लगता है। यह आंतरिक संवेदना है, जो बाहरी कर्मों से अधिक महत्वपूर्ण है।

 

जब व्यक्ति अपने भीतर अहंकार, क्रोध, लोभ और द्वेष को समाप्त करता है, तो वह निर्मलता की ओर बढ़ता है। यही निर्मलता भक्ति की ओर ले जाती है। भक्ति का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण है। जब व्यक्ति दया को आत्मसात करता है, तो उसका हृदय कोमल और संवेदनशील हो जाता है, और यही कोमलता उसे भक्ति की ओर मार्गदर्शन करती है।

 

भक्ति का सच्चा स्वरूप तब प्रकट होता है, जब व्यक्ति अपने अहंकार को छोड़कर परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण करता है। यह समर्पण व्यक्ति को ध्यान की ओर अग्रसर करता है। ध्यान से आत्मा अपने परम स्वरूप से परिचित होती है। जब व्यक्ति संसार की मोह-माया को त्यागकर अपने भीतर देखता है, तो उसे यह एहसास होता है कि वह स्वयं भी उसी परमात्मा का अंश है।

 

ध्यान के माध्यम से व्यक्ति में विवेक जाग्रत होता है, जो उसे सही और गलत की पहचान करने में मदद करता है। यही विवेक उसे ज्ञान की ओर ले जाता है। ज्ञान कोई बाहरी वस्तु नहीं है, बल्कि यह हमारे भीतर छिपा हुआ सत्य है। जब व्यक्ति ध्यान के माध्यम से भीतर झांकता है, तो वह यह समझता है कि सच्चा ज्ञान कहीं बाहर नहीं, बल्कि उसी के भीतर है।

 

सच्चा ज्ञान प्राप्त होने के बाद, व्यक्ति मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होता है, और वह सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर परमशांति को प्राप्त करता है।

 

कबीरदास जी हमें यह सिखा रहे हैं कि जीवन में सच्ची शांति, प्रेम और ज्ञान प्राप्त करने के लिए हमें पहले अपने हृदय में दया लानी होगी। दया के बिना भक्ति अधूरी है, भक्ति के बिना ध्यान अधूरा है, और ध्यान के बिना ज्ञान अधूरा है। इसलिए हमें जीवन में सच्ची उन्नति के लिए इस क्रम को अपनाना चाहिए – दया → भक्ति → ध्यान → ज्ञान।

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