बदलाव की बयार

चिंतन का विषय -4 धर्म की जगह व्यक्ति प्रभावना क्यों ?

हमारी धार्मिक और सामाजिक स्थिति इतने कमजोर होती जा रही है कि हम अपना अस्तित्व ही समाप्त करते जा रहे हैं। पंथ, संत और अहिंसा के नाम पर धर्मिक परम्पराओं, क्रियाओं और व्यवस्थाओं में श्रावक की श्रद्धा लुप्त होती जा रही है। इन सब का परिणाम यह हो रहा है जैन संस्कृति और संस्कारों को बताने वाले प्राचीन मंदिर, दिगम्बर साधु और शास्त्र इन सब की उपेक्षा होती जा रही है। जो मंदिर, शास्त्र और दिगम्बर संत अधिक लोकप्रिय या प्रसिद्ध हैं उनकी उप्रेक्षा तो नही हो रही है पर जो मंदिर, शास्त्र और दिगम्बर साधु मात्र साधना करते हैं पढ़ते और पढ़ाते हैं उनकी उपेक्षा हो रही है।

क्या समाज ने कभी उनके लिए चिंतन किया कि उनका आगे क्या होगा? ऐसा दिखता है कि वर्तमान में प्राचीन मंदिरों के इतिहास और दिगम्बर संतो के मूलगुणों से अधिक उपासना व्यक्ति विशेष की हो रही है। गुणों को तो गौण कर दिया गया है इसलिए धर्म की प्रभावना से अधिक व्यक्ति विशेष की प्रभावना हो रही है। आज स्थिति यह है कि हम किसी को बिना जाने, बिना उससे मिले, मात्र उसके बारे में सुनकर कर उस व्यक्ति, संत और मंदिर के प्रति धारण बना लेते हैं और फिर वहाँ जाते नही हैं ओर ना ही उसकी साधना में सहयोगी बनते हैं, बल्कि उसकी निंदा आलोचना करते हैं। हो सकता है किसी का पुराना व्यवहार ऐसा रहा हो या आचरण में कमी हो पर यदि उसने स्वयं को व्यवस्थित कर लिया हो तो पुरानी बातों को याद कर अभी भी उस से वैसा ही व्यवहार करना उचित नही है। अगर इसी विचार पर चलें तो रावण और महावीर को तीर्थंकर नही मान सकते है क्योंकि 365 मिथ्या मत की स्थापना महावीर ने अपने पूर्व भव में मरीचि के रूप में की थी और रावण ने सीता का हरण किया था।

जैन धर्म मे कहा है कि व्यक्ति की नही उसके अंदर की बुराइयों से घृणा करो। समाज ने पंथ और संत वाद में यही दृष्टि रखना बंद कर दिया है। उसके परिणाम भी हम देख रहे हैं कि समाज का स्तर कितना गिर रहा है। इस गिरावट के पीछे कारण है व्यक्ति विशेष की पूजा। सत्य है कि आज चाहे संत हो, मंदिर हो, श्रावक हो,यह सब गुणों को नही व्यक्ति को देख रहे हैं। उसका परिणाम यह है कि समाज मे कुरीतियां बढ़ रही हैं। किसी धनाढ्य, बड़े संत ने कोई कार्य धर्म के अनुसार नहीं किया तो कई कारण बताकर उस पर चर्चा नहीं की जाती है। पर वही गलती किसी कमजोर व्यक्ति से, साधक संत से हो जाए तो वह चर्चा का केन्द्र बन जाता है। उसकी उपेक्षा की जाती है। यह सब क्या है। वर्तमान में चिंतन का विषय पंचामृत अभिषेक, स्त्रियों द्वारा अभिषेक, छोटा बड़ा साधु आदि नहीं है। चिंतन का विषय यह है कि हम अपने पीढी को व्यसनों से, आधुनिक परम्परााओं से, भाषा संस्कृति से, मांसाहार करने से, धर्म और धर्मात्माओं के प्रति हो रही उपेक्षा भाव से कैसे बचा सकते हैं। इतिहास गवाह है कि जिस समाज के श्रावक का आचरण दूषित होता है उस समाज का इतिहास और अस्तित्व समाप्त होता जाता है।

आज यही हो रहा है। जैन धर्म के अहिंसा, अपरिग्रह आदि कई सिद्धांत समाप्ति की और जा रहे हैं। आज हम ही उनका पालन नही कर रहे हैं और ना ही हम आज धर्म का स्वाध्याय करना चाहते हैं। तो आओ चलें… एक बार अपनी धारण को बदलंे। धर्म और धर्मात्माओं को ग्राउंड लेवल से समझने के लिए तैयार रहें और एक ऐसी कडी बनाएं जिससे हमें वास्तविकता का परिचय हो सके कि आज हम कहां है और पहले कहां थे और यह सब अंतर क्यों आया इस पर चिंतन करें।

चिंतन का विषय की तीन कहानियां भी पढ़ लीजिए

चिंतन का विषय-3

चिंतन का विषय-2

चिंतन का विषय-1

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