संत परिचय

संत परिचय-5 : आज पढ़िए आचार्य श्री अजित सागरजी महाराज का परिचय  


श्रीफल जैन न्यूज की ओर से जैन संतों और साध्वियों की परिचय की श्रृंखला शुरू की जा रही है। जैन धर्म में मुनि बनना एक बहुत साहसिक और वैराग्य पूर्ण कार्य है। हर कोई व्यक्ति मुनि नहीं बन सकता। जैन दर्शन में मुनियों के आचार- विचार और दिनचर्या पर बहुत ही स्पष्ट और सख्त नियम बनाए हैं। श्रीफल जैन न्यूज का उद्देश्य है कि इस श्रृंखला के जरिए पाठक जान सकें कि जैन धर्म जीवन जीने की कला है। यह अध्यात्म और विज्ञान पर आधारित जीवन मार्ग है और इनके बारे में पढ़कर लोग धर्म की राह पर चल सकें। इसी श्रृंखला की पांचवी कड़ी में आज प्रस्तुत है वात्सल्य वारिधि भक्त परिवार के राजेश पंचोलिया की कलम से आचार्य श्री अजित सागर महाराज के बारे में…


प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांति सागर जी गुरुदेव की अक्षुण्ण मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परम्परा के चतुर्थ पट्टाधीश आचार्य श्री अजित सागर जी का जन्म श्रीचंद्र नाथप्रभु के मोक्ष कल्याणक पर मध्यप्रदेश आष्टा नगर के समीप भौरा ग्राम में रूपा देवी और जवर चंद जी के चतुर्थ पुत्र के रूप में हुआ। उनका नाम श्री राजमल जी रखा गया। शुभ दिन था फागुन शुक्ला 7 सप्तमी विक्रम संवत 1982 सन 1925

प्रथम गुरु दर्शन

18 वर्ष की अल्प उम्र सन 1943 में गुरुदेव श्री वीर सागर जी के दर्शन किये तथा संघ में प्रवेश की अनुमति लेकर संघ में प्रवेश किया। 2 वर्षो में शास्त्रों का स्वाध्याय निरंतर चलता रहा।

व्रत प्रतिमा

झालरापाटन राजस्थान में 20 वर्ष की उम्र में 7 प्रतिमा तथा ब्रह्मचर्य व्रत के नियम आचार्य कल्प श्री वीर सागर जी से ग्रहण किये।

मुनि दीक्षा

आचार्य श्री वीर सागर जी की समाधि कारण द्वितीय पट्टाधीश आचार्य श्री शिव सागर जी से मुनि दीक्षा हेतु श्रीफल भेंट कर निवेदन किया। विक्रम संवत 2018 कार्तिक सुदी 4 रविवार सन 1961 को सीकर राजस्थान में मुनि दीक्षा ग्रहण कर श्री राजमल जी मुनि श्री अजित सागर जी बन गए। मुनि श्री अजित सागर जी आचार्य श्री शिव सागर जी के साथ ही रहे।

आचार्य पद

तृतीय पट्टाधीश आचार्य श्री धर्म सागर जी की समाधि के पश्चात आपको चतुर्थ पट्टाधीश ज्येष्ठ शुक्ला 10 संवत 2044 में 7 जून 198 को उदयपुर में आचार्य पद दिया गया।

आचार्य पद का आज्ञा पत्र

आचार्य श्री अजित सागर जी ने स्वास्थ्य प्रतिकूल होने के कारण 31 जनवरी 1990 को संघस्थ मुनि श्री वर्द्धमान सागर जी को अपने बाद परम्परा के आचार्य पद का संस्कृत में आज्ञा पत्र लिखा।

संल्लेखना

वैशाख शुक्ला पूर्णिमा संवत 2047, सन् 1990 को आपकी समाधि हो गई।

मुनि शिष्य – 8

1 मुनि श्री हित सागर जी

2 मुनि श्री पुण्य सागर जी

3 मुनि श्री सौम्य सागर जी

4 मुनि श्री हेमंत सागर जी

5 मुनि श्री विराग सागर जी

6 मुनि श्री चिन्मय सागर जी

7 मुनि श्री कीर्ति सागर जी

आर्यिका – 7

1 आर्यिका श्री अनंत मति जी

2 आर्यिका श्री सौम्य मति जी

3 आर्यिका श्री दक्ष मति जी

4 आर्यिका श्री सौरभ मति जी

5 आर्यिका श्री चैत्य मति जी

क्षुल्लक – 2

वर्षायोग – 29

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