-मनुष्य के समस्त पापों का नाश करने वाला होता है गंधोदक
-शरीर के किसी भी भाग की पीड़ा हर लेता है यह पवित्र जल
संसार में एक द्रव्य ऐसा भी है, जिसे लगाने से रोग, शोक, दुःख आदि दूर हो जाते हैं और वह है गंधोदक। सुगंधित जल को ही गंधोदक कहा जाता है। जब यह गंधोदक मंत्रों के उच्चारण के साथ प्रतिष्ठित जिन प्रतिमा अर्थात् भगवान के शरीर से स्पर्शित होता है तो वह पवित्रता और पूज्यता को प्राप्त हो जाता है। दाहिने हाथ की मध्यमा और अनामिका से गंधोदक लगाना चाहिए।
वैसे तो गंधोदक लगाने के कई मंत्र हैं, लेकिन यहां एक मंत्र दिया जा रहा है…
निर्मलं निर्मले करणं ,पवित्रं पापनाशनम् ।
जिन गन्धोदकम् बंदे अष्ट कर्म विनाशनम ।।
अर्थात् यह निर्मल है, निर्मल करने वाला है, पवित्र है और पापों को नष्ट करने वाला है, ऐसे जिन गंधोदक की मैं वंदना करता हूं। यह मनुष्य के अष्टकर्माे का नाशक है। गंधोदक अत्यंत महिमावान है।
आदिपुराण भाग एक में गंधोदक का महत्व बताते हुए लिखा गया है…
माननीय मुनीन्द्राणां जगतामेक पावनी।
साव्याद्- गन्धाम्बु-धारास्मान् या स्म व्योमाप-गायते ।।
जो मुनींद्रों के द्वारा भी सम्माननीय है तथा संसार को पवित्रता प्रदान करने में अनुपम – अद्वितीय है, वह आकाश गंगा के समान प्रतीत होने वाला गंधाबुधारा (अभिषेक) हम सबका कल्याण करे।
‘जिण चरण-कमल-गंधोदएण, तणु सिंचवि कलिमलु हणि उजेण।
संसार महावय णासठाइं,पवि हियहं जेण सुह-भावणाई।।
अर्थात
श्री जिनेन्द्र भगवान के चरण कमलों का गंधोदक लेकर जिसने अपने शरीर को सिंचित किया, उसने कलि-पाप मल का नाश करके, पवित्र हृदय में सुख की भावना को प्राप्त कर लिया।
दान- शासन नामक शास्त्र में कहा गया कि भगवान के चरणों में चढ़ाया हुआ जल, अरिहंत भगवान के पावन चरणों के स्पर्श से पवित्र हो जाता है। अतः वह देवेन्द्र आदि के द्वारा ललाट, मस्तक तथा नेत्रों में लगाने योग्य है। इसके स्पर्शमात्र से ही पूर्व में अनेकों जन पवित्र हो चुके हैं इसलिए गंधोदक को भव्य जीव सदैव ललाट, दोनों नेत्र तथा मस्तक पर हमेशा भक्ति के साथ लगाएं। इसका अर्थ हुआ कि शरीर के जिस अंग में पीड़ा हो, यह वहां लगाना चाहिए।
-मोक्ष स्थान को प्राप्त अरिहंतों के चरणों में अर्पित जल (गंधोदक) को ललाट पर इसलिए लगवाया जाता है ताकि सिद्धालय में हमारा शीघ्र गमन हो। दोनों नेत्र युगल में लगाने का प्रयोजन सम्यगदर्शन की विशुद्धि की कामना है तथा मस्तक पर लगाने का उद्देश्य निर्मल सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति की इच्छा है। इस प्रकार आत्मतत्व की एवं रत्नत्रय की प्राप्ति की भावना से तीनों स्थानों पर इसे लगाना चाहिए।
– मैना सुंदरी ने अपने पति श्रीपाल सहित 700 लोगों का कुष्ठ रोग गंधोदक से ठीक किया था।
(अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज की डायरी से )
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