अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज के 9वें दीक्षा दिवस पर श्रीफल जैन न्यूज में उन्हीं की कलम से उनकी जीवनगाथा प्रस्तुत की जा रही है। पाठकों को इस लेखनमाला की एक कड़ी हर रोज पढ़ने को मिलेगी, आज पढ़िए इसकी पांचवीं कड़ी….
5. माताजी की प्रेरणा
आर्यिका वर्धितमति माता जी का मौन खुला तो उनसे बात हुई। माता जी ने पूछा था कि नाम क्या है, कहां रहते हो, क्या करते हो तब मैंने अपना परिचय दिया कि मेरा नाम चक्रेश है। मेरे पिताजी का नाम सोमचंद्र और माता का नाम विमला देवी है। मैं विजय भैया की बुआ का लड़का हूं और सनावद के पास पिपलगोन में रहता हूं। अभी 10वीं कक्षा में पढ़ता हूं। मैं तो यहां बस दीक्षा देखने आया हूं।
उसके बाद माता जी ने मुझे संघ में रहने की प्रेरणा दी और कहा कि मेरी बड़ी बहन आर्यिका प्रशांतमति माता जी हैं। दोनों भैया (राजू -विजय) की दीक्षा हो जाएगी तो आचार्य श्री सेवा करने वाला कोई नहीं है। तुम संघ में रहकर संघ की व्यवस्था देखो और और धार्मिक अध्ययन करो। आचार्य श्री का वात्सल्य बहुत है। वह तुम्हें अच्छे से रखेंगे। घर में क्या रखा है, इतने बड़े आचार्य के पास किसे रहने को मिलता है। दोनों भैया की दीक्षा के बाद तुम कुछ दिन तो रुकना फिर तुम्हें जैसा अच्छा लगे, वह करना। मैं आचार्य श्री के पास बैठा था, तभी माता जी वहां आईं।
माता जी ने आचार्य श्री को कहा कि चक्रेश को आशीर्वाद दो कि अब यह संघ में ही रहे। आचार्य श्री ने उत्तर दिया कि हमारा तो आशीर्वाद है लेकिन जैसा उसका मन हो, वैसा ही करे। संघ में रहे तो अच्छा है, अपनी आत्मा का कल्याण करेगा। संघ में किसी चीज की कमी नहीं है, सब कुछ अच्छा ही है। बहुत सारी दीदी या और इनके गांव का मनोज तो संघ में रहने के लिए ही तो आया है। दोनों साथ में अच्छे से रहेंगे। कोई परेशानी हो तो यह बताए। आचार्य श्री ने माता जी को कहा कि अब तुम्हीं इसे समझाना। माता जी ने कहा कि आचार्य श्री कितने प्यार से कह रहे हैं. इतना तो वह कभी किसी को नहीं कहते।
संघ में अच्छे रहो। दो-तीन दिन तक माता जी यही समझाती रहीं, फिर एक दिन मैंने कहा कि दीक्षा के बाद कुछ समय संघ में रहूंगा। अगर अच्छा लगा और धर्म में मन लगा तो फिर आगे की बात करूंगा। माता जी ने पिच्छी लगा कर आशीर्वाद दिया और आचार्य श्री के पास लेकर गईं। आचार्य श्री ने भी मुस्कुराते हुए पिच्छी लगा कर आशीर्वाद दिया।
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2 . यात्रा
3 . संघ प्रवेश
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