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” कर्म रूपी शत्रुओं को जो जीत जाए, उसे जिन कहा जाता है। जिनका देवता यही जिनदेव हो, उन्हें कहते हैं जैन । जिन कुल में गर्भावस्था से निर्वाण पर्यन्त 53 क्रिया संस्कार होते हैं, जो इन सभी क्रिया संस्कारों को पूरा करे उसे जैन कुल का समझना चाहिए। (संदर्भ – सागर धर्मामृत हिंदी अनुवाद सुपार्श्वमती माताजी)
– जो जिन भगवान तीर्थंकर के चरणकमल की पूजा, आराधना, स्तुति करे और उनकी वाणी को आचरण में उतारे, वह जैन है । ऐसा उनके गणधरदेवादि देव ने कहा है। (नियमसार)
– जिन भगवान से संबंधित अथवा जिन भगवान के द्वारा कथित (जो लिंग) वह जैन है। (प्रवचनसार )
-जैन शब्द पद्मपुराण भाग दो में पृष्ठ संख्या 58 पर आया है। श्री चैत्य भक्ति में जैन शब्द आया है और अन्य कई जगहों पर भी यह मिलता है।
– इन सभी परिभाषाओं से जैन का अर्थ हुआ, जो अहिंसा आदि धर्म का पालन करता है और जिसका कुल, जाति शुद्ध हो, वह जैन है।
-जिन परम्परा का अर्थ है – जिनेन्द्र देव द्वारा प्रवर्तित दर्शन। जो जिनदेव के अनुयायी हैं, उन्हें जैन कहते हैं। जिन शब्द बना है संस्कृत के -जि- धातु से। जि यानी – जीतना ।
जिन यानी जीतने वाला । जिन्होंने अपने मन को जीत लिया, अपने तन-मन और वाणी को जीत लिया और विशिष्ट आत्मज्ञान को पाकर सर्वज्ञ या पूर्णज्ञान प्राप्त किया, उन्हें जिनेन्द्र या जिन कहा जाता है । जैन धर्म अर्थात् जिन भगवान का धर्म…
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