निर्वाण लाडू क्यों ?
पूज्य आदित्य सागर जी महाराज
बन्धुओं ! हम सभी जिनेन्द्र देव के आराधक इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि हमारे आराध्य अरिहंत – सिद्ध परमेष्ठी किसी भी तरह का आहार ग्रहण नहीं करते हैं , तो हमारे मन में यह जिज्ञासा होना स्वाभाविक है कि फिर हम निर्वाण दिवस पर लाडू का अर्घ क्यों अर्पित करते हैं ?
बन्धुओं ! सर्व प्रथम तो हमें निर्वाण लाडू के आकार – प्रकार पर दृष्टि डालना होगी , हम सभी को ज्ञात हैं कि लाडू गोलाकार ही होता है , और निर्वाण लाडू सदैव बूंदी से ही निर्मित होता है।
अब हम इस विषय की गहराई पर दृष्टि डालते हैं। निर्वाण लाडू स्वयं जीव का प्रतीक है जिसे अर्पित कर जीव जन्म – जरा – मृत्यु से मुक्ति की कामना करता है। अर्थात स्वयं को ही समर्पित करता है।
तात्पर्य यह है कि हे भगवन्त ! जैसे जीव अनादि से है और अनन्त काल तक रहेगा ऐसे ही यह लाडू है जिसका न कोई आदि है न अन्त है और जो यह असँख्यात बूंदी से निर्मित है यह मेरे असँख्यात भवों का प्रतीक है तथा यह गोलाकार होने से इधर – उधर लुढकता फिरता है ऐसे ही प्रभु मैं भी अनादि काल से स्वभाव के विपरीत मन – वचन – काया की वैभाविक प्रवृत्ति करने के कारण अनन्त भवों – पर्यायों को धारण करता हुआ इस संसार में जन्म – जरा – मृत्यु की वेदना को भोग रहा हूँ , भव – भव भटक रहा हूँ , इधर से उधर लुढ़कता फिर रहा हूँ।
अतः हे देवाधिदेव ! अब मैं इस जन्म – जरा – मृत्यु की वेदना एवँ कर्मजनित क्षणिक साता – असाता से त्रस्त हो चुका हूँ , ऊब गया हूँ अब मैं अपने सकल कर्मों का क्षय करके इस जन्म – मरण की परम्परा से , नाना नश्वर पर्यायों से मुक्ति चाहता हूँ , और आपके समान अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त होकर अविनाशी शुद्ध पर्याय में सिद्धालय में प्रतिष्ठित होकर निजानन्द , चिदानन्द का भोग चाहता हूँ, अनन्त अक्षय सुखों का पान करना चाहता हूँ ।
इसी निमित्त स्वयं के प्रतीक स्वरूप इस लाडू को अर्पित कर मैं भव – भटकन से , लुढ़कन से मुक्ति की कामना करता हूँ।
बन्धुओं ! इन्ही भावों से प्रेरित होकर निर्वाण दिवस पर स्वयं के निर्वाण की भावना से निर्वाण लाडू का अर्घ समर्पित किया जाता है और हमें भी इन्ही भावना को भाते हुए लाडू का अर्घ समर्पित करना चाहिए ।
प्रस्तुति – राजेश जैन दद्दू