पद्मपुराण पर्व 85 में एक कहानी आती है। जो इस बात को बात का ज्ञान कराती है कि कर्म किसी को भी नहीं छोड़ता। तो यह है कहानी –
गुणनिधि नामक एक मुनिराज ने दुर्गगिरी पर्वत पर जाकर आहार त्याग दिया और चार माह का वर्षायोग धारणकर ध्यान में लीन हो गए। इस मुनि की देव-असुर आदि ने स्तुति की। चार माह पूर्ण होने पर वह मुनिराज आकाशमार्ग से विहार कर गए। उनके बाद मृदुमति नाम के मुनिराज आहार के लिए नगर में आए। राजा सहित नगर के सभी लोगों ने समझा कि यह वही मुनिराज हैं जिन्होंने चार माह का उपवास किया था। सभी ने उनके दर्शन, पूजन कर नाना प्रकार के पदार्थों का उन्हें आहार करवाया। नगरवासी कहने लगे कि आप वही मुनिराज राज हो, जो पर्वत पर चार माह का उपवास करते हुए ध्यान में लीन थे और देवों ने आपकी वंदना की थी।
इतना कहने पर भी मुनिराज कुछ नहीं बोले, चुप रहे। पाप कर्म का उदय उनके मन में हो गया और वे माया में आ गए। मुनिराज की आयु जब पूर्ण हुई तो वह मरणकर देव हुए। पर उनके पुण्य जब खत्म हुए तो वह वहां से आकर हाथी बने जिसका नाम त्रिलोकमण्डल रखा था। देखा पाप और मायाचारी का फल। यह वही हाथी था जो भरत को देखकर शांत हो गया था।
सीख– कर्म किसी को नहीं छोड़ता है। मायाचारी के कारण मुनिराज को भी हाथी बनना पड़ा। जीवन में धर्म-ध्यान, मायाचारी आदि कषायों से रहित होकर करना चाहिए।
(अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज की डायरी से)
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