कथा सागर

कहानी- खुशियों के दीप

कहानी- खुशियों के दीप

मृदुल “पुष्प”, बांसवाड़ा (राजस्थान)

 

शहर से लगभग 10-15 किलोमीटर दूर ही ईश्वर का गांव था। गांव के एक छोर पर तालाब से कुछ फर्लांग पर उसका मकान। वह देखने में इतना पक्का भी नहीं था। कुछ फीट खोदी गई नींव पर पत्थरों से चुनाई के बाद ईंट पर ईंट जमाकर बनाए दो कमरे। बीच में छोटी पड़साल और मुख्य दरवाजे के आगे आंगननुमा खाली जगह। ऊपर टीन डालकर उस पर बिछाए गए कवेलू। उसी में अपने जीवन के उत्तरार्ध को जी रहे मां-बाप, पत्नी व दो छोटे बच्चों के साथ ईश्वर अपना परम्परागत व पैतृक कुम्हारी का काम कर गुजर-बसर कर रहा था।

छह सदस्यों के परिवार में आय का कोई अन्य स्रोत नहीं था। न ही इतनी अ​धिक खेतीबाड़ी, कि उससे होने वाली उपज से पूरे साल परिवार का पेट भर जाए और सामाजिक दायित्वों का निर्वहन भी हो सके। हां। बुजुर्ग मां-बाप को वृद्धावस्था पेंशन में कुछ रुपए जरूर मिलते थे। वह भी इतने नहीं, कि कभी कोई संकट आ जाए तो उबर सके। कभी भी प्रतिकूल हालात का रोना रोये बगैर ईश्वर अपने परिवार को ईश्वर की इच्छा मानकर संभाल कर चल रहा था।

बच्चे सरकारी स्कूल में थे, तो उनके एक समय के भोजन सहित कपड़े, कॉपी, किताब की चिंता नहीं थी। शहर से अ​धिक दूरी नहीं हाेने के कारण गांव में सालभर में दो से तीन बार कोई न कोई भामाशाह आकर स्कूल में पढ़ने वाले सभी बच्चों की मदद कर देते थे, इससे ईश्वर पर भी बच्चों का अतिरिक्त आ​र्थिक भार नहीं पड़ता था।

अपनी मेहनत के बूते ईश्वर और उसके परिवार की गाड़ी चल रही थी। कहते हैं कि संकट कहकर नहीं आता। बीते साल एकाएक महानगरों ही नहीं, ब​ल्कि उसके गांव तक एक ऐसी महामारी पहुंची, जिसने लगभग हर घर को चपेट में ले लिया। ऐसे हालात में सरकार ने सब बंद कर दिया। किसी को घर से बाहर नहीं निकलने की अनुमति दी गई।

ऐसे में तालाब से मिट्टी लाना, उसे गूंथना और हाथ से चक्के पर चलाकर मटके आदि बनाना सब कुछ मानो छूट गया। जैसे-तैसे हो रही गुजर-बसर के बीच महामारी के कारण अब हालात ऐसे हो गए कि दो समय की रोटी का जुगाड़ करना भी मु​श्किल हो गया।

कुछ दिन तो निकले, किंतु आने वाले दिनों के बारे में ईश्वर चिंतित रहने लगा। उसे चिंतामग्न देखकर एक दिन बुजुर्ग पिता बोले- बेटा, चिंता मत कर। सब दिन एक सरीखे नहीं होते हैं। मैंने भी छप्पनिया जैसा समय देखा है। सब ठीक हो जाएगा। छप्पनिया शब्द सुनकर ईश्वर चौंका और बोला- बाबा, यह छप्पनिया क्या है? पिता बोले- बेटा अपने इलाके में अकाल पड़ा था।

खेतों में एक दाना नहीं उपजा। लोग खाने को मोहताज हो गए, किंतु समय के साथ हालात बदले। इसलिए तू भी चिंता छोड़ दे। पिता के संबल भरे शब्दों से ईश्वर को कुछ हिम्मत बंधी। सरकार की ओर से विकट हालात में जी रहे लोगों के लिए अनाज-पानी की व्यवस्था हुई तो परिवार की परेशानी भी दूर हुई। गांव में महामारी की चपेट में आए लोग भी कुछ समय बाद ठीक हो गए, वहीं कुछ दिनों के बाद आवाजाही भी शुरू होने लगी।

सभी के प्रयासों से हालात अनुकूल हुए। जीवन पटरी पर लौटा तो ईश्वर भी कामकाज में जुटा। कुछ ही दिनों बाद दिवाली आने वाली थी। वह तालाब से मिट्टी लाकर दीये बनाने लगा। पत्नी सुशीला भी घर का कामकाज निबटाकर हाथ बंटाने लगती। कुछ ही दिनों में बहुत सारे दीये तैयार हो गए। दीपावली के दस दिन पहले ही वह दीयों को बोरे में भरकर शहर पहुंचा और ठेले पर फेरी लगाने लगा।

शहर की गलियों में दीये ले लो दीये, दीये ले लो दीये… की आवाज लगाता। कुछ दीये बिकते तो कई भाव पूछकर ही मौन रह जाते। ईश्वर ठेला लिए आगे बढ़ जाता। एक दिन वह फेरी लगाते-लगाते एक मंदिर के समीप पहुंचा।

वहां एक संत गुजर रहे थे। उन्होंने उसके ठेले और उसमें रखे दीयों को देखा। संत ने अपने साथ चल रहे अनुयायी को बुलाया और कुछ कहा। ईश्वर कुछ सुन नहीं पाया और आगे बढ़ा तो अनुयायी ने आवाज लगाई, ओ दीये वाले। रुको। उसने मुड़कर देखा और अपने पैर थाम लिए।

कहां के हो ? इतने दीये कहां से लाए ? कितना कमा लेते हो ? एक के बाद एक उसने कई सवाल पूछ लिए। ईश्वर ने कहा- बाबूजी रामपुर का हूं। कुम्हार हूं। खुद दीये बनाता हूं और बेचता हूं। कमाई का क्या है, जितने बिके, उतने सही, बाकी अगले दिन बिकने की उम्मीद में वापस घर ले जाता हूं। कल फिर आऊंगा। किसी और गली-मोहल्ले में फेरी लगाऊंगा।

तुम्हारे पास कितने दीये हैं? क्या सारे एक साथ बेचेगो ? प्रश्न सुनकर ईश्वर से उत्तर देते नहीं सूझा। बोला- बाबूजी गरीब के साथ क्यों मजाक करते हो। सारे दीये एक साथ कौन लेगा ? मैं लूंगा। संत ने कहा है, इससे सारे दीये खरीदो।

बाबूजी मुझ पर दया मत करो। मेरे मैले-कुचैले कपड़ों पर मत जाओ। जो नसीब में होगा, मिल जाएगा। इतने सारे दीयों का क्या करोगे, आप क्यों मेरी चिंता कर रहे हो ? तुम्हारे ये जो प्रश्न है, उसका उत्तर संत देंगे। जाओ उनसे मिलो।

ईश्वर सहमा सा कुछ दूर अन्य अनुयायियों के साथ खड़े संत के पास पहुंचा और अपने मन की बात कही। संत बोले- सारे दीये यह लोग खरीदेंगे। इन्हें खरीद कर शहर में उन लोगों को बेचने के लिए निशुल्क देंगे, जो अपनी विपन्नता के कारण दिवाली पर अपने घर में खु​शियां नहीं ला पाते हैं। तुम्हारे सारे दीये खरीदेंगे और देने वालों से रुपए नहीं लेंगे।

इससे तुम्हारे दीये भी बिक जाएंगे और पाने वाले इन्हें बेचकर अपने घर खुशी ले जाएंगे। क्या तुम इससे खुश नहीं हो ? यह सुनकर ईश्वर सामने खड़े संत के पैरों में गिर पड़ा। कुछ देर बाद वह अपना ठेला वहीं गली में एक किनारे खड़ा छोड़ अनुयायी के साथ अपने गांव की राह पर चल पड़ा।

साथ में पीछे बड़ी गाड़ी थी। घर पहुंचते ही उसने अपने आंगन और भीतर पड़साल में रखे दीयों को एक-एक कर बोरों में भरा। गाड़ी में चढ़ाया। अनुयायी ने उसका मेहनताना दिया तो चेहरे पर खुशी छलक उठी। उसे अपने पिता के शब्द याद आ गए कि सब दिन एक सरीखे नहीं होते हैं। चिंता छोड़ दे। संत के आशीर्वाद और लक्ष्मी की कृपा बरसते देख ईश्वर ऊपर आसमान में देखकर हाथ जोड़े मुस्कराता हुआ खड़ा रहा।

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