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दोहों का रहस्य -45 सच्ची भक्ति और आत्मकल्याण के मार्ग पर चलें : सांसारिक विषयों की जगह ईश्वर से जोड़ें मन


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 45वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


सुमिरन में मन लाइ ए, जैसे नाद कुरंग कहे।

कबीर बिसरे नहीं प्रान तजे तेहि संग।


कबीरदास जी इस दोहे में सुमिरन (ईश्वर का ध्यान) को जीवन का सर्वोच्च और अनिवार्य तत्व बताते हैं। वे कहते हैं कि ईश्वर का स्मरण ऐसा होना चाहिए कि वह मन, प्राण और चेतना में पूरी तरह रच-बस जाए, ठीक वैसे ही जैसे हरिण (कुरंग) को शिकारी की बांसुरी की ध्वनि मोह लेती है। यह आकर्षण इतना गहरा होता है कि वह अपने प्राणों की भी परवाह नहीं करता। इसी प्रकार, भक्त को भी ईश्वर की भक्ति में इतना लीन होना चाहिए कि मृत्यु तक उसका ध्यान न टूटे।

यह दोहा आत्मानुभूति और परमात्मा के साथ एकाकार होने की स्थिति को दर्शाता है। जब कोई साधक सच्चे हृदय से ईश्वर का स्मरण करता है, तो यह साधारण ध्यान नहीं रह जाता, बल्कि एक अविचल स्थिति बन जाती है, जहां आत्मा और परमात्मा का मिलन होता है। यही भक्त का परम लक्ष्य है—अपनी चेतना को इतनी गहराई से प्रभु में डुबो देना कि सांसारिक विकार और मोह स्वतः समाप्त हो जाएं।

जिस प्रकार हरिण अपने आसपास के खतरे को भूलकर नाद के आकर्षण में बंध जाता है, उसी प्रकार साधारण मनुष्य भी सांसारिक सुखों और मोह-माया में उलझा रहता है। लेकिन कबीर यह कहना चाहते हैं कि जैसे हरिण का नाद से बंधन अटल रहता है, वैसे ही यदि मनुष्य का मन सांसारिक विषयों की जगह ईश्वर से जुड़ जाए, तो वह जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो सकता है। सच्ची भक्ति का अर्थ यह है कि जीवन के अंतिम क्षणों तक भी प्रभु का स्मरण न टूटे।

यह दोहा केवल सतही रूप में भक्ति का संदेश नहीं देता, बल्कि चेतना के गहरे स्तर तक पहुंचने की प्रेरणा देता है। कबीर यह स्पष्ट कर रहे हैं कि जब तक मनुष्य ईश्वर के ध्यान में पूरी तरह नहीं डूबता, तब तक उसकी भक्ति अधूरी है। जिस प्रकार हरिण नाद के बिना नहीं रह सकता, उसी प्रकार भक्त को भी ईश्वर-स्मरण के बिना नहीं रहना चाहिए—यहां तक कि मृत्यु तक भी नहीं। यही सच्चा भक्ति मार्ग और आत्मकल्याण का उपाय है।

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