व्यक्तित्व समाचार

भक्तों की पीड़ा सहज में ही हर लेते थे आचार्य विद्याभूषण सन्मतिसागर जी महाराज

-राष्ट्र ऋषि, सिंहरथ प्रवर्तक, शताधिक संस्थाओं के प्रेरणा स्रोत परमपूज्य आचार्य विद्याभूषण सन्मतिसागर जी महाराज का जीवन परिचय
-त्रिलोकतीर्थ धाम में गुरुमन्दिर उद्घाटन पर विशेष आलेख

प्रस्तुति -मनोज नायक | प्राचीन काल से ही भारतीय वसुंधरा ऋषि-मुनियों की जननी रही है। यहां समय-समय पर तीर्थंकर एवं महापुरुषों का अवतार होता रहा है। भारतवर्ष के मध्य प्रान्त में चम्बल के पावन तट पर स्थित अम्बाह तहसील के ग्राम बरबाई, जिला मुरैना में अगहन वदी पंचमी, 10 नवम्बर 1949 को श्रीमन्त सेठ बाबूलाल जी जैन व श्रीमती सरोज देवी जैन के घर आपका जन्म हुआ।

आपके बाबा श्री मटरेलाल जी (मुनि श्री प्रभुसागर जी) के संस्कारों के कारण ही आपने 17 फरवरी 1972 में 20 वर्ष की युवा अवस्था में श्री सम्मेद शिखरजी की निर्वाण भूमि पर आचार्य श्री 108 सुमतिसागर जी महाराज से क्षुल्लक दीक्षा प्राप्त की। दीक्षा के उपरान्त कई वर्षों तक जयपुर एवं सागर में अनेक शास्त्रों का अध्ययन करते हुए आपने जैनदर्शन, काव्यतीर्थ, न्यायतीर्थ, आयुर्वेदरत्न, ज्योतिषरत्न, सिद्धान्तरत्न, धर्मालंकार आदि में स्नात्कोत्तरीय शिक्षा के साथ-साथ व्याकरण, हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत, प्राकृत, पाली आदि अनेक भाषाओं में निष्णांतता प्राप्त की। आपको वात्सल्यरत्नाकर पूज्य आचार्य श्री विमलसागर जी महाराज का आशीर्वाद प्राप्त रहा।

आप देश के विभिन्न नगरों में धर्मप्रभावना करते हुए श्रावकों को धार्मिक शिक्षा के लिए प्रेरित करते रहे। आपने सागर में 10 नवम्बर 1977 को ‘स्याद्वाद शिक्षण परिषद्’ की स्थापना कराई, जिसका उद्देश्य युवाओं को संगठित कर, जैनदर्शन के सिद्धान्तों का प्रचार-प्रसार व समाजोत्थान करना था। युवाओं में स्वाध्याय की रुचि बढ़ाने के लिए आपने बहुत ही सरल और सहज भाषा में ‘मुक्ति- पथ की ओर’ नामक पहली पुस्तक लिखी।

मुनिदीक्षा- मासोपवासी आचार्य श्री सुमतिसागर जी महाराज के कर कमलों से सोनागिर जी में 31 मार्च 1988 को महावीर जयन्ती पर आपकी मुनि दीक्षा सम्पन्न हुई। आपकी अद्भुत प्रतिभा को देखते हुए आपके गुरुजी ने आपको उसी समय आचार्यकल्प पद पर विभूषित किया। पट्टाचार्य पद- आचार्य गुरुवर श्री सुमतिसागर जी महाराज ने नरवर ( शिवपुरी ) में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा के अवसर पर आपको पट्टाचार्य पद से विभूषित किया।

आप आचार्य शान्तिसागर ( छाणी ) परम्परा के पंचम पट्टाचार्य रहे । सिंहरथ प्रवर्तन – सोनागिर जी में सन् 1994 में फागुन माह की अष्टाह्निका पर्व के अवसर पर पंचकल्याणक महोत्सव के समापन पर ‘भूतो न भविष्यति’ की कहावत को चरितार्थ करते हुए लाखों जन-समूह के मध्य सिंहरथ का सफल प्रवर्तन कराया। दीक्षाएं – आपने लाखों लोगों को संयम के पथ पर चलने की प्रेरणा देकर मुक्ति पथ की ओर अग्रसर किया और सैकड़ों मुनि, आर्यिका, क्षुल्लक, क्षुल्लिका दीक्षाएं प्रदान की ।
साहित्य-सृजन – आप साहित्य जगत में उच्च कोटि के कवि और लेखक थे। आपने शताधिक कृतियों का सृजन किया। आपने द्रव्यसंग्रह, रत्नकरण्ड श्रावकाचार, आचरांगसार, छहढाला, कुन्दकुन्दगीता, पुण्य-पाप शतक, काव्यप्रसून, स्याद्वाद गीतांजलि, मुक्तक निकुंज आदि अनेक पुस्तकों, विधानों, पूजन आदि की रचना की।

स्थापित संस्थाएं एवं पंचकल्याणक – आपने अनेक शिक्षण संस्थाओं, जिन-मन्दिरों की स्थापना एवं पंचकल्याणक कराये, जिनमें प्रमुख रूप से ललितपुर, मदनपुर, सोनागिर, मंगलगिरी सागर, लखनादौन, भोपाल, शिवपुरी, सिवनी, घनसौर, पिंडरई, चन्देरी, एत्मादपुर, भौमा, नरवर, कान्हीवाडा, करहल, इटावा, गुरुग्राम, ज्योतिनगर, राधेपुरी, शकरपुर दिल्ली, नोएडा, बुढ़ाना, खतौली, मुजफ्फरनगर, मवाना, मेरठ, गाजियाबाद, बागपत, बड़ागाँव आदि शामिल हैं।
त्रिलोकतीर्थ रचना -आप सन् 1997 में अतिशय क्षेत्र बड़ागांव पधारे तथा देवों ने आपको आभास कराया कि हे! सन्मतिसागर आपकी भावना यहीं पूरी होगी। तभी से यहां पर आपकी प्रेरणा एवं आशीर्वाद से विश्व की अनुपम कृति ‘त्रिलोकतीर्थ धाम’ का निर्माण हुआ।

समाधि-जन जन की हृदयचेतना में वास करने वाले ऐसे महान सन्त 14 मार्च 2013, शकरपुर दिल्ली में लाखों भक्तों को छोड़कर स्वर्ग सिधार गये। उनके दिव्य शरीर को लाखों भक्त अपने कन्धों पर बिठाकर पैदल चलकर त्रिलोकतीर्थ बड़ागांव लाये, जहां उनका अन्तिम संस्कार किया गया।

आप अपने भक्तों की पीड़ा सहज में ही हर लेते थे। आपको वचनसिद्धि थी। आप जैसा कहते थे, वैसा हो जाता था। अनेक चमत्कार आपके जीवन से सम्बंधित हैं, जिनका वर्णन करना असम्भव है।
गुरुमंत्र – आपने भक्तों को ‘ॐ नमः स्वात्म देवाय’ गुरु मंत्र दिया। जो श्रद्धालुजन इस मंत्र का जाप गुरु-समाधि पर आकर करते हैं, उन्हें मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

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