श्रीफल जैन न्यूज़ आपके लिए लाया है जैन संस्कार क्रियाओं का अर्थ और उन्हें पूरा करने के विधि-विधान। जैन शास्त्र कहते है कि जैन संस्कृति से जुड़ी 53 क्रियाओं के विधिवत पालन से श्रावक, परमत्व को प्राप्त हो सकता है। पहली कड़ियों में हमने गर्भान्वय की 53 क्रियाओं के लक्षण में से 14 लक्षण तक के बारे में बात की थी। आज की कड़ी में अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी की वाणी पर आधारित लेख में विस्तार से जानिए, व्रतचर्या क्रिया, व्रतावतरण क्रिया, विवाह क्रिया, वर्णलाभ क्रिया , कुलचर्या क्रिया , गृहीशिता क्रिया, प्रशांति क्रिया, गृह त्याग क्रिया के बारे में....
15. व्रतचर्या क्रिया

ब्रह्मचर्य आश्रम को धारण करने वाला वह ब्रह्मचारी बालक अत्यंत पवित्र व स्वच्छ जीवन बिताता है। कमर में रत्नत्रय के चिह्न स्वरूप तीन लड़ की मूंज की रस्सी, टांगों में पवित्र अर्हंत कुल की सूचक उज्ज्वल व सादी धोती, वक्षस्थल पर सात लड़ का यज्ञोपवीत, मन वचन व काय की शुद्धि का प्रतीक सिर का मुंडन इतने चिह्न धारण करके अहिंसाणुव्रत का पालन करता हुआ गुरु के पास विद्याध्ययन करता है। यह द्विज की पहचान के चिह्न है। वह कभी हरी दांतौन नहीं करता, पान खाना, अंजन लगाना, उबटन से स्नान करना व पलंग पर सोना आदि बातों का त्याग करता है। स्वच्छ जल से स्नान करता है तथा अकेला पृथ्वी पर सोता है। अध्ययन क्रम में गुरु के मुख से पहले श्रावकाचार और फिर अध्यात्म शास्त्र का ज्ञान कर लेने के अनंतर व्याकरण, न्याय, छंद, अलंकार, गणित, ज्योतिष आदि विद्याओं को भी यथाशक्ति पढ़ता है। अष्ट मूलगुणों का जीवन पर्यन्त त्याग करता है। हिंसा पापों से विरत होने के लिए व्रत धारण करता है। यह क्रिया वह गुरु की साक्षी में पूजा आदि क्रिया करके करता है।

16. व्रतावतरण क्रिया

विद्याध्ययन पूरा कर लेने पर बारहवें या सोलहवें वर्ष में गुरु साक्षी में, देवपूजादि विधिपूर्वक गृहस्थ आश्रम में प्रवेश पाने के लिए उपरोक्त सर्व व्रतों को त्यागकर, श्रावक के योग्य आठ मूलगुणों को ग्रहण करता है। और कदाचित् क्षत्रिय धर्म के पालनार्थ अथवा शोभार्थ कोई शस्त्र धारण करता है। पहले जो ब्रम्हचर्य व्रत ले रखा था, उसका भी त्याग कर देता है। अगर वह संयम के मार्ग जाता है तो जीवन पर्यन्त उसे पुनः धारण करता है और गृहस्थ अवस्था में जाना चाहता है तो तब तक ब्रह्मचर्य का पालन करता है, जब तक विवाह ना हो जाए।

17. विवाह क्रिया

विवाह की इच्छा होने पर गुरु साक्षी में सिद्ध भगवान् व पूर्व में की गई अर्थात् प्रथम क्रिया में तीन अग्नियों की पूजा विधिपूर्वक, अग्नि की प्रदक्षिणा देते हुए, कुलीन कन्या का पाणिग्रहण करे। सात दिन पर्यंत दोनों ब्रह्मचर्य से रहें, फिर तीर्थयात्रादि करें। तदनंतर कंकन बन्धन से विमुक्त हुए केवल संतानोत्पत्ति के लिए स्त्री के ऋतुकाल में सेवन करें। शारीरिक शक्तिहीन हों तो पूर्ण ब्रह्मचर्य से रहें।

18. वर्णलाभ क्रिया 

पहले की गई पूजन विधिपूर्वक पिता अन्य प्रमुख जनों की साक्षी पूर्वक उसको कुछ संपति व घर आदि देकर धर्म व न्यायपूर्वक जीवन बिताते हुए पृथक रहने के लिए कहता है और दान- पूजन आदि करते हुए अपना जीवन बिताता है।

19. कुलचर्या क्रिया

अपनी कुल परंपरा के अनुसार देव पूजादि गृहस्थ के षट्कर्मों को यथाविधि नित्य पालता है, यही कुलचर्या है।

20. गृहीशिता क्रिया 

धार्मिक क्षेत्र में तथा ज्ञान के क्षेत्र में वृद्धि करता हुआ, अन्य गृहस्थों के द्वारा सत्कार किये जाने योग्य गृहीश या गृहस्थाचार्य होता है। सब गृहस्थों का स्वामी बनना चाहिए।

21. प्रशांति क्रिया 

अपने पुत्र को गृहस्थ का भार सौंपकर विरक्त चित्त होकर विशेष रूप से धर्म का पालन करते हुए शांत वृत्ति से रहने लगता है। पंचेंद्रियों के विषयों में आसक्ति नहीं रखता है, नित्य स्वाध्याय करता है और नाना प्रकार के उपवास करता रहता है।

22 . गृह त्याग क्रिया 

गृहस्थाश्रम में कृतार्थता को प्राप्त होकर, विधिपूर्वक अपने ज्येष्ठ पुत्र को घर की संपूर्ण संपत्ति व कुटुंब पोषण का कार्य भार सौंपकर तथा धार्मिक जीवन बिताने का उपदेश करके स्वयं घर त्याग देता है। वह उपदेश भी देता है कि मैंने अपने धन के तीन भाग किए, उनका तुम इस प्रकार विनियोग करना। पहला भाग धर्म में लगाना, दूसरा भाग अपने घर के कार्यों में लगाना, तीसरा भाग अपने सहजनमा बन्धुओं को बराबर बांट देना। पुत्री भी पुत्र के समान भाग पाने योग्य है।

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