सारांश
मदनगंज में बिराजे वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर का जनमानस पर प्रभाव जानना हो तो आदिश्वर जी की कहानी ज़रूर पढ़िए । भरे-पूरे परिवार के साथ धरियावद में सांसारिक जीवन में रहते हुए मदनगंज में वात्सल्य वारिधि आचार्य के दर्शन के बाद उमंग जगी और दस हज़ार से भी ज्यादा लोगों के सामने खड़े होकर आचार्य श्री से दीक्षा लेने की इच्छा जता दी । अब आचार्य श्री के आशीर्वाद से आदिश्वर १२ फ़रवरी को दीक्षा लेकर सांसारिक जीवन त्याग हमेशा के लिए मुनि,सन्यासी जीवन अपना रहे हैं। पढ़िए आदिश्वर जी जैन की कहानी, उन्हीं की ज़ुबानी…धरियावद निवासी समाजसेवी निखिल भूता के ज़रिए श्रीफल जैन न्यूज़ संवाददाता से उनसे की विशेष चर्चा …
श्रीफल जैन न्यूज़ – आपने मन में दीक्षा का भाव कैसे जगा ?
आदिश्वर जैन – मैंने संसार के प्रिय मेरा दायित्व निभा लिया । मैंने यह पाया कि संसार में कोई सुखी नहीं है। आप अगर सही रूप से समझें तो मैं कहूँगा कि चार प्रकार की गतियां होती है। पशु गति बंधन में वध,भूख,प्यास है । मनुष्य गति में कई दुख है । ईष्ट की प्राप्ति न हो तो दुख होता है। कोई दरिद्रता से दुखी, कोई अनिष्ट से दुखी, कोई तन से दुखी, कोई मन से दुखी, कोई संतान से दुखी । और तो और य जब शरीर के बारे में सोचा तो पाया कि वो भी दुख का कारण है । शरीर को भोग चाहिए । न जाने किस-किस सुख सुविधा की लालसा है । निरंतर मानव तृष्णा के पीछे पड़ा हुआ है । आपसी होड़ में उलझ कर रह गया है । इस तरह के विचार मेरे मन में आते रहे थे । लेकिन किसी सद् गुरु की कृपा नहीं हुई । जब मदनगंज में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का प्रवचन सुना तो मन की छिपी इच्छा इस तरह बाहर निकली कि हज़ारों लोगों की उपस्थिति में दीक्षा लेने की संकल्प ले लिया।
श्रीफल जैन न्यूज़ – आपने कहा कि संसार में दुख है इसीलिए दीक्षा ले रहा हूँ । कहीं ये सांसारिक जीवन से पलायन तो नहीं माना जाएगा ? आपका उद्देश्य संसार के दुखों के दूर जाना है या मोक्ष की प्राप्ति है ?
आदिश्वर जैन – मेरा सांसारिक जीवन परिपूर्ण रहा है । धन,दौलत,शोहरत सब है, शरीर भी ठीक है । लेकिन मैंनें जीवन को यथार्थ रूप में देखा है । यह शरीर आत्मशुद्धि के काम भी आ सकता है और इच्छा पूर्ति के लिए भी उपयोगी है । अब तक इसका प्रयोग इच्छा पूर्ति के लिए हुआ अब मैं और मेरा यह शरीर आत्मशुद्धि, आत्मबोध और आत्ममंथन की प्रक्रिया से गुजरते हुए अपने परमतत्व को प्राप्त करेगा । एक तरफ मेरे लिए सांसारिक जीवन की आकुलताएं थी और दूसरी तरफ अथाह गहराइयों से भरी शांति, शांत चित्त । जब आत्मा अपने स्वरूप में आ जाती है तो मनुष्य जीवन में शांति छा जाती है । मैं इसी शांति की अनुभूति को और बढ़ाना चाहता हूं ।मैंने अपनी सोई हुई आत्मा को जगाया है और अब उसे शाश्वत सुख देने की प्रक्रिया शुरु करना चाहता हूं
श्रीफल जैन न्यूज़ – आपमें वैराग्य का स्थाई भाव कब आया ?
आदिश्वर जैन – इसके लिए नियमित अभ्यास चाहिए । मैंने महसूस किया है कि कर्मों का प्रभाव आत्मा पर रहता है । मैं आत्मा के प्रति पुरुषार्थ करूं, मेरे अनेक कर्म काट लूं । मैंने सदाचार,व्रत,नियम किए, संयम धारण किया । भगवान जिनेन्द्र की भक्ति की, रात्रि भोजन का त्याग किया । सात्विक भोजन अपनाया, तामसिक भोजन को जीवन से हटाया । २० वर्ष की आयु से ही मेरे मन में ये भाव आने लगे थे । आज ६७ वर्ष की आयु में वैराग्य का स्थाई भाव अब मेरे जीवन का सत्य बन चुका है ।
श्रीफल जैन न्यूज़ – आप दीक्षा किस स्थान पर ले रहे हैं ?
आदिश्वर जैन – मेरे आदर्श वर्धमान सागर जी हैं । उनकी वाणी में इतना प्रभाव है कि आप अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकते। मैंने अनुभव किया । उनके साथ लंबे समय तक जाता रहा, फिर घर लौट आता रहा। सालों तक उनसे इसी तरह अपने संबंध निभाता रहा । फिर धीरे-धीरे समता भाव जागृत हुआ । उनके प्रति मेरे इसी भाव ने मुझमें समता भाव पैदा किया । मेरी दीक्षा मदनगंज में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के सानिध्य और आशीर्वाद से, १२ फरवरी को मैं सांसारिक जीवन का परित्याग कर मोक्ष मार्ग को अपना रहा हूँ
श्रीफल जैन न्यूज़- अपने सांसारिक जीवन के बारे में कुछ बताइए ?
आदिश्वर जैन – सांसारिक जीवन में मेरा अच्छा कारोबार है । मेरे दो पुत्र व पुत्रियाँ हैं। किराणा, प्रोपर्टी, होलसेल का बिजनेस था । धन के मामले में ईश्वर की कृपा रही है, धन का अभाव नहीं है। मैंने जीवन में जो चाहा वो मुझे मिला है ।लेकिन शांति नहीं मिली और तृष्णा को रोकना ज़रूरी था ।
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