दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 79वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…
कहता तो बहुत मिला, कहता मिला न कोई।
सो कहता वह जान दे, जो नहीं कहता होय।
कबीर दास जी इस दोहे में कथनी और करनी के अंतर को स्पष्ट कर रहे हैं। वे कहते हैं कि इस संसार में बहुत से लोग उपदेश देने वाले मिल जाते हैं, जो ज्ञान और भक्ति की बातें तो खूब करते हैं, लेकिन उस ज्ञान को अपने जीवन में आत्मसात करने वाले बहुत ही कम होते हैं।
कबीर दास जी बताते हैं कि दुनिया में ऐसे लोग बहुत मिल जाते हैं जो धर्म, भक्ति, सत्य और मोक्ष की बातें करते हैं। वे दूसरों को उपदेश देने में तो आगे रहते हैं, लेकिन स्वयं उन बातों को जीते नहीं हैं।
कहने का अर्थ यह है कि जो लोग भक्ति, सत्य और ईश्वर प्रेम की बातें करते हैं, वे वास्तव में उसे अपने जीवन में उतारते नहीं हैं। ऐसे व्यक्ति बहुत कम मिलते हैं जो केवल उपदेश न देकर, स्वयं उसे अपने जीवन में उतारते हैं और उसका अनुसरण करते हैं।
यहां कबीर दास जी कहते हैं कि सच्चा ज्ञानी या सच्चा साधक वही है, जो केवल उपदेश देने वाला न हो, बल्कि अपने जीवन में उसका पालन भी करता हो। ऐसा व्यक्ति अपने विचारों और सत्य के लिए अपने प्राण भी त्याग सकता है।
केवल बातें करने से कोई महान नहीं बनता, बल्कि आचरण से व्यक्ति की वास्तविकता सिद्ध होती है। जो व्यक्ति अपने उपदेशों को खुद के जीवन में उतारता है, वही सच्चा साधक और ज्ञानी है। जो अपने विचारों, सत्य और भक्ति के मार्ग पर दृढ़ रहता है, वही वास्तविक रूप से श्रेष्ठ है।
जो केवल उपदेश देने तक सीमित रहता है और स्वयं उसका पालन नहीं करता, वह ज्ञान का अधिकारी नहीं है।
इस दोहे का गहन भावार्थ यह है कि सिर्फ बातें करना आसान है, लेकिन अपने कहे अनुसार जीवन जीना कठिन है। सच्चा साधक वही होता है, जो सत्य के मार्ग पर चलता है और यदि आवश्यकता पड़े तो अपने सिद्धांतों के लिए अपने प्राण भी त्याग कर सकता है।
अर्थात, जब तक हमारे कथनी और करनी एक नहीं होगी, समाज हमें सम्मान नहीं देगा। अतः कथनी और करनी को एक करने का प्रयास करें।
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